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जिला पुस्तकालय के पास पत्र-पत्रिकाओं को खरीदने के लिए नहीं है बजट

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चंपावत जिला पुस्तकालय में पढ़तें छात्र-छात्राएं। - फोटो : अमर उजाला
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पुस्तकें अच्छी और सच्ची मित्र होती हैं लेकिन चंपावत जिले में पुस्तकालय होने के बावजूद यह बात आधी-अधूरी ही लागू हो पा रही है। चंपावत में जिला पुस्तकालय होने के बावजूद पढ़ने वालों के लिए सुविधाओं का अभाव है। पुस्तकालय में 47 माह बाद भी न तो पदों का सृजन हो सका है और न ही एक भी नई पुस्तक खरीदी जा सकी है। इसके अलावा बिजली का बिल जमा नहीं करने से मार्च के पहले सप्ताह में बिजली का कनेक्शन भी कट चुका है। 

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47.85 लाख रुपये से निर्मित जिला पुस्तकालय भवन का 16 मई 2015 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री मंत्रीप्रसाद नैथानी ने शुभारंभ किया। जिला पुस्तकालय में एक साथ 100 लोगों के पढ़ने की क्षमता है लेकिन उम्दा पुस्तकों की कमी से यहां आने वालों की तादाद बमुश्किल 20 है।

पुस्तकालय में विज्ञान, पर्यावरण, राजनीति, इतिहास, साहित्य, समाज, संस्कृति, दर्शन, नैतिक शिक्षा से लेकर विविध क्षेत्रों की करीब 2000 पुस्तकें हैं लेकिन चार साल से एक भी नई पुस्तक नहीं खरीदी गई है। यहां तक कि समाचार पत्र और पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी धन नहीं है। पुस्तकालय अध्यक्ष सहित एक भी पद का सृजन नहीं हो सका है। मुख्य शिक्षाधिकारी कार्यालय के एक बाबू को यहां संबद्ध कर किसी तरह पुस्तकालय का संचालन हो रहा है। 
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स्टाफ की कमी के बावजूद जिला पुस्तकालय नियमित रूप से खुल रहा है। बजट नहीं मिलने से नई पुस्तकें, अखबार और पत्र-पत्रिकाएं नहीं खरीदी गई हैं। बिजली का बिल जमा नहीं होने से बिजली का कनेक्शन भी कट चुका है। डॉ. वीरेंद्र सिंह मेहता

पुस्तकालय की सामान्य व्यवस्था में तो खामी नहीं है लेकिन चार वर्ष से नई पुस्तकों के नहीं आने से पुराने प्रकाशकों और लेखकों की किताबें ही पढ़नी पड़ रही हैं। एकता गिरि
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पुस्तकालय में न समाचार पत्र आता है और न ही प्रतियोगी पत्रिकाएं। इतने बड़े पुस्तकालय में इनकी व्यवस्थाएं जरूर होनी चाहिए। 
पूजा ओली 

किताबों को पढ़ने के लिए पुस्तकालय में घंटों रहना पड़ता है। इस दौरान प्यास लगने पर पेयजल की भी व्यवस्था नहीं है। 
रितु बिष्ट 

अखबार और पत्रिकाओं के पुस्तकालय में नहीं होने से उन्हें जेब से खरीदना पड़ता है। शिक्षा विभाग को इतनी न्यूनतम जरूरतों को पूरा करना चाहिए। 
जीवन जोशी 

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