आपदा सिर पर, स्वास्थ्य विभाग की तैयारी सिफर
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मानसून के दौरान टनकपुर-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग की संवेदनशीलता सबसे ज्यादा रहती है। हादसों से लेकर कई तरह के खतरे यहां रहते हैं। इनसे निपटने को स्वास्थ्य विभाग भरपूर तैयारी का दावा करता है, लेकिन हकीकत में अस्पतालों के हाल ठीक नहीं हैं। खासकर इस एनएच के पास के स्वास्थ्य केंद्रों के बुरे हाल हैं। ज्यादातर अस्पताल में या तो डॉक्टर नहीं हैं, या वे इन दूरदराज के केंद्रों में रहते नहीं हैं।
टनकपुर-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग के 150 किलोमीटर में से टनकपुर से घाट तक का 122 किमी का हिस्सा चंपावत जिले में पड़ता है। मानसूनी बारिश से रोड की खस्ताहाल की वजह से रोड बंद होने से लेकर हादसों तक का अंदेशा बढ़ जाता है। लेकिन इनसे निपटने के लिए एनएच के नजदीक के अस्पतालों की दशा अच्छी नहीं है। चल्थी, स्वांला, धौन और बाराकोट में स्वास्थ्य केंद्र हैं। परंतु ये केेंद्र फर्स्ट-एड लायक भी नहीं हैं। इसके चलते हादसों के वक्त इन केंद्रों में मरीजों को लाने से बचा जाता है।
इस वक्त भी धौन राजकीय एलोपैथिक अस्पताल में डॉक्टर की कुर्सी खाली है। डॉक्टर विहीन स्वांला अस्पताल की व्यवस्था श्रीरीठा साहिब से एक डॉक्टर को संबद्ध कर की गई है। पर अधिकांश अस्पताल इमरजेंसी तो दूर, ओपीडी लायक भी नहीं है। कई अस्पतालों में वार्डब्वाय मरहम-पट्टी का काम निपटा रहे हैं। वहीं हाईवे के अधिकांश अस्पतालों के डॉक्टरों के अस्पताल परिसर में न रहने से लोगों को नुकसान झेलना पड़ता है। इन अस्पतालों के डॉक्टर और दूसरा स्टाफ चंपावत, टनकपुर या कहीं और रहते हैं।