सूखे और ओले के रूप में आसमान से बरसी आफत ने मानर, गोशनी, मारागांव, तपनीपाल, डिक्टी, ओलीगांव, डिगड़वाल गांव, कमलेख आदि गांवों के किसानों की कमर तोड़ दी है। विभिन्न प्रजातियों के फल, बेमौसमी सब्जियों, आलू तथा अन्य खेती के लिए यहां की उर्वरा भूमि सैकड़ों किसानों की आजीविका का साधन है। इस वर्ष पहले सूखे की मार से गेहूं और दलहनी फसलें बर्बाद हुईं।
इसके बाद फल और बेमौसमी सब्जियों की उम्मीद को झटका 28 मई को हुई भीषण ओलावृष्टि से लगा। ओलों की मार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां एक भी पॉलीहाउस सुरक्षित नहीं बचे। अब सूखे के कारण तीसरी फसल बरबादी के कगार में पहुंची है।
डिक्टी के किसान पंडित महेश डिक्टिया का कहना है कि यहां का किसान टकटकी निगाह से सरकार की देख रहा है। किसान का सब कुछ लुट गया है। ऐसी आफत इससे पहले कभी नहीं आई। प्रमुख आलू और फल उत्पादक गोपाल सिंह मनराल का कहना है कि सभी ने कर्ज लेकर आलू की खेती की थी। सूखे ने आलू को तथा ओलों ने फलों के उत्पादन को चौपट कर दिया। किसानों को सरकार की मदद और सहारे की आवश्यकता है। गोशनी के शेखर कापड़ी का कहना है कि नुकशान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खेतीखान की सब्जी और फलमंडी पूरे सीजन भर वीरान पड़ी रही। सरकार ने किसानों की सुध नहीं ली है। तपनीपाल के ललित मोहन का कहना है कि यहां का किसान खून के आंसू बहा रहा है। ऐसी विपदा में सरकार भी हमारी ओर पीठ किए हुए है। डिगडवाल गांव के नवीन बोहरा का कहना है कि किसानों को अब जहर खाना ही शेष बचा है। डीएचओ एचसी तिवारी का कहना है कि उनके द्वारा किए गए सर्वेक्षण में सामने आया कि इस क्षेत्र के आधा दर्जन गांवों में 80 फीसदी से अधिक फसलों को नुकसान हुआ है। जिसकी रिपोर्ट शासन को पहले ही भेजी जा चुकी है।