निर्भया कांड के दरिंदों को अब तक सजा नहीं मिलने से लोगों में आक्रोश है। रविवार को युवा भवन में हुए अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में महिलाओं ने बेबाकी से अपनी राय रखी।
महिलाओं का कहना था कि देश की सर्वोच्च अदालत से सजा सुनाए जाने के बाद भी दुष्कर्मी कानूनी दांवपेंच का फायदा उठाकर सजा की तारीख टालने में कामयाब हो रहे हैं। दुराचारियों के खिलाफ सजा में देरी से आम लोगों में डर और अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ को तभी सार्थक माना जा सकेगा जब अपराधियों को तुरंत सजा के साथ बेटियों की सुरक्षा का पुख्ता बंदोबस्त हो।
सजा में देरी से आहत हो रहीं महिलाएं
निर्भया कांड के दोषियों की फांसी की सजा बार-बार टलना पीड़िता के परिजनों के साथ ही अन्य महिलाओं को को भी आहत कर रहा है। चारों दोषियों को जल्द फांसी के फंदे पर लटकाना चाहिए ताकि पीड़िता के परिजनों को न्याय मिल सके। सबीना, गृहणी
देना होगा आत्मरक्षा का प्रशिक्षण
वक्त का तकाजा है कि महिलाओं को सशक्त बनाया जाए। आज बेटियों को आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षण देना जरूरी हो गया है ताकि वह किसी भी कठिन परिस्थिति में खुद की सुरक्षा कर सके। गीता बिष्ट, गृहणी।
महिला सशक्तिकरण की तरह पुख्ता हो महिला सुरक्षा
राजनीतिक आरक्षण सहित कई कदम उठा कर महिला सशक्तीकरण के प्रयास हो रहे हैं लेकिन महिलाओं की सुरक्षा पर तवज्जो नहीं दी जा रही है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए पूरे इंतजाम किए जाने चाहिए।
मीना फत्र्याल, गृहणी।
अधिवक्ता न करें दुराचारियों की पैरवी
मासूम बेटियों, महिलाओं के साथ दुराचार करने वाले आरोपियों की वकीलों को पैरवी नहीं करनी चाहिए ताकि उन्हें जल्द सजा दी जा सके। केस चलने के बाद फैसला आने में लंबा वक्त लग जाता है। दीपा बोहरा, गृहणी।
लोकलाज से महिलाएं नहीं उठा पाती आवाज
दूरदराज ग्रामीण इलाकों में भी महिलाओं के साथ कई अपराध होते हैं लेकिन लोकलाज और कानूनी जानकारी न होने से महिलाएं आवाज नहीं उठा पातीं। इससे अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं। रेखा बोहरा, गृहणी।
सजा में देरी दुर्भाग्यपूर्ण
निर्भया कांड हुए सात साल से ज्यादा बीत चुके हैं लेकिन अपराधियों को अभी तक फांसी न मिल पाना दुर्भाग्यपूर्ण है। फास्ट ट्रेक कोर्ट बनने के बाद भी सजा मिलने में देरी से महिलाओं में डर पनप रहा है। -हेमा कुंवर, गृहणी।
जेल के बजाय सीधे फांसी का फंदा
महिलाओं के साथ दुराचार के आरोपियों को जेल में पालने के बजाय तत्काल फांसी के फंदे में लटकाना चाहिए जिससे अन्य अपराधी महिलाओं के साथ दुराचार करना तो दूर, ऐसा करने की सोच तक न सकें। सुनीता टम्टा, गृहणी।
बच्चों से दोस्ताना व्यवहार करें अभिभावक
अभिभावक अपने बच्चों से दोस्ताना व्यवहार करें ताकि वे उनसे हर बात को सहजता से कह सकें। ताकि बच्चे गलत दिशा में न भटकें और उनके साथ होने वाली घटनाओं की जानकारी परिवार को दे सके। -मीनाक्षी बिष्ट, गृहणी।
फास्ट ट्रेक कोर्ट बढ़ाएं
देश में अधिक से अधिक फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने चाहिए ताकि तय समय के भीतर आरोपियों को सजा दिलाई जा सके। सजा मिलने में देरी से पीड़ित परिवार को काफी तकलीफ झेलनी होती है।
-राखी गहतोड़ी, गृहणी।
अपराध से बचाव की कानूनी जानकारी मिले
स्कूलों में अपराध से बचाव को कानून की जानकारी दी जाए। ताकि छात्र-छात्राओं को विभिन्न अपराधों की जानकारी, उनमें मिलने वाली सजा और अपराधों के खिलाफ आवाज उठाने की जानकारी मिल सके। -उमा फर्त्याल, गृहणी।
बढ़ाए जाएं महिला सुरक्षा के उपाय
महिला सुरक्षा के लिए उचित प्रबंध किए जाने चाहिए। बढ़ते महिला अपराधों के चलते अभिभावक अपनी बेटियों को स्कूल, कॉलेज, ट्यूशन आदि अकेले भेजने में डरते हैं। वहीं महिलाएं अपने को असुरक्षित महसूस कर रही हैं। -दीपा सनवाल, गृहणी।
संगठित आवाज उठाना जरूरी
मासूम बेटियों, महिलाओं के साथ दुराचार के बाद उनकी हत्या के बाद लोग संवेदना देने को हाथों में कैंडल पकड़कर आ जाते हैं। कुछ दिनों बाद घटना भूल जाते हैं। अपराधों के खिलाफ लोगों को संगठित होकर आवाज उठानी चाहिए। -मनीषा जोशी, गृहणी।
मौके पर मिले सबक
महिलाओं के साथ दुराचार करने वालों को जनता को सौंप देना चाहिए ताकि उन्हें मौके पर ही सबक मिल सके। मौजूदा व्यवस्था में पीड़ित अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं जबकि आरोपी कानूनी दांवपेंच के जरिए वक्त काटते हैं। -किरन करायत, गृहणी।
बच्चों को संस्कार देना भी जरूरी
कानूनी पहलुओं के अलावा अभिभावकों को अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने होंगे। महिलाओं का सम्मान करने की सीख देनी होगी ताकि लड़के दूसरों की मां-बेटियों को अपनी मां-बेटी की तरह सम्मान की नजरों से देखें। हेमा भटट, गृहणी।
दरिंदों को कितनी बार मिलेंगे बचाव के मौके
निर्भया कांड के दोषियों को बिना वक्त गंवाए फांसी मिले, आखिर दोष साबित होने के बाद भी उन्हें बचाव के कितने मौके मिलेंगे। वहीं निर्भया के हत्यारों को सात साल बाद भी सजा न मिलना सोचनीय है। - पूनम उपाध्याय, गृहणी।