चंपावत। पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना का मकसद किसानों की तकलीफ पर मरहम लगाना है, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। इस फसल बीमा योजना से चंपावत क्षेत्र के किसानों को फायदा होने के बजाय नुकसान झेलना पड़ा है। उन्होंने जितनी राशि बीमा प्रीमियम के लिए दी, नुकसान होने के बावजूद उससे कम रकम उन्हें मिल सकी।
पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना के तहत पांच (फ्रेंचबीन, मिर्च, आलू, टमाटर और अदरक) फसलों का बीमा कराया जाता है। इसके तहत पिछले साल जिले के कुल 4359 काश्तकारों ने बीमा कराया। सबसे तगड़ा झटका चंपावत क्षेत्र के 986 काश्तकारों को लगा। उन्होंने बीमा प्रीमियम के लिए 21.53 लाख रुपये दिए, लेकिन उन्हें नुकसान की भरपाई के तौर पर महज 14.26 लाख रुपये का भुगतान हुआ। किसानों का कहना है कि मौसम की गड़बड़ी से हुए भारी नुकसान के बावजूद नाम मात्र की राशि देकर उनके साथ छलावा किया गया है।
डीएचओ सतीश कुमार शर्मा का कहना है कि फसल के नुकसान के मापन के लिए जिले में सात (चंपावत, बाराकोट, लोहाघाट, मंच, पाटी, पूर्णागिरि और पुल्ला-गुमदेश) इकाई बनाई गईं हैं। इन्हें स्वचालित मौसम स्टेशन से मापा जाता है। ये स्टेशन बारिश, नमी, तापमान के आधार पर नुकसान को जांचते हैं। ऐसे में गड़बड़ी होना मुश्किल है। फिर भी किसानों की शिकायत को आगे रखेंगे। (संवाद)
दूसरे इलाकों को कम हुआ नुकसान
चंपावत। जिले में चंपावत को छोड़ शेष अन्य छह क्षेत्रों में बीमा कराने वालों को कुछ कम नुकसान हुआ है। इन इलाकों के 3373 किसानों से 1.02 करोड़ की प्रीमियम राशि आई थी, जबकि उन्हें बीमा का भुगतान 2.60 करोड़ रुपये हुआ। इसके बावजूद यहां के किसान भी मिली रकम को नुकसान के सापेक्ष नाकाफी बता रहे हैं।
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जिन क्षेत्रों में जितना नुकसान हुआ है, उसके हिसाब से बीमा दिया गया है। नुकसान के आकलन में बीमा कंपनी की कोई भूमिका नहीं है। इसका आधार स्वचालित मौसम स्टेशन की रिपोर्ट होती है।
संजय चौधरी, जिला प्रतिनिधि, एसबीआई सामान्य बीमा कंपनी, चंपावत।
कर्ज लेकर अदरक की फसल बोई। सात हजार रुपये बीमा में खर्च किए, लेकिन नुकसान होने पर महज चार हजार रुपये मिले। ऐसे बीमा का क्या औचित्य? -बंशीधर गहतोड़ी।
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पिछले साल कोरोना काल में बड़ी उम्मीद के साथ अदरक की खेती की और नुकसान से बचाव के लिए बीमा कराया। लेकिन सात हजार प्रीमियम चुकाने के बाद उन्हें सिर्फ आठ हजार रुपये दिए गए। -रघुवर दत्त।
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ऐसा लग रहा है कि बीमा नुकसान होने पर भरपाई के लिए नहीं, बल्कि किसानों का खून चूसने के लिए है। खेती बर्बाद होने पर 4500 रुपये के बीमा के बदले महज पांच हजार रुपये दिए गए। -कृष्णानंद।
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जैसे बुरे हाल इस बार रहे, वैसे कभी नहीं थे। लॉकडाउन में खूब मेहनत से खेती की। बारिश की कमी से 30 हजार से अधिक का नुकसान हुआ लेकिन चार हजार बीमा में खर्च करने के बावजूद पांच हजार रुपये मिले।- प्रेम सिंह।