राज्य बनने के बाद बनी चंपावत विधानसभा सीट में मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा, कांग्रेस के बीच ही रहा है। इस सीट पर दो बार कांग्रेस और एक बार भाजपा ने कब्जा जमाया है। चंपावत विधानसभा सीट का इतिहास सत्ता के साथ जाने का है। यानी जिस पार्टी का विधायक यहां से जीता, प्रदेश में सरकार भी उसी की बनी। इस बार भी ऐसा ही कुछ अनुमान लगाया जा रहा है।
उत्तराखंड बनने से पूर्व तक मौजूदा चंपावत सीट के वोटर पिथौरागढ़ और खटीमा विधानसभा सीट में शामिल थे। टनकपुर-बनबसा का हिस्सा खटीमा और चंपावत का शेष पहाड़ी क्षेत्र पिथौरागढ़ सीट में शामिल था। राज्य बनने के बाद बनी चंपावत सीट में हुए अब तक के तीन चुनाव में एक बार भाजपा और दो बार कांग्रेस के हाथ जीत लगी। हर बार विजयी रहे विधायक से जुड़ी पार्टी की ही सूबे में सरकार बनी है।
उत्तराखंड की पहली विधानसभा के लिए चंपावत ने कांग्रेस के युवा नेता हेमेश खर्कवाल को जिताया, जबकि 2007 के चुनाव में भाजपा की बीना महराना यहां की विधायक बनी। 2012 के चुनाव में हेमेश खर्कवाल ने बड़े अंतर से जीत दर्ज कर इस सीट को वापस कांग्रेस की झोली में डाल दिया। पिछले चुनाव में यहां बसपा के प्रत्याशी ने अच्छी टक्कर दी थी। लेकिन तब के बीएसपी प्रत्याशी मदन महर अब भाजपा में हैं। इस बार 15 फरवरी को होने वाले मतदान में चंपावत सीट से श्रीपूर्णागिरि और चंपावत तहसील के 87048 वोटर मताधिकार का उपयोग करेंगे। इस सीट में अब तक मैदानी हिस्से टनकपुर-बनबसा की भूमिका निर्णायक रही है और इस बार भी यहां के करीब 39 हजार वोटर भाग्यविधाता बनेंगे।
वर्ष विधायक व पार्टी सरकार
2002 हेमेश खर्कवाल (कांग्रेस) कांग्रेस
2007 बीना महराना (भाजपा) भाजपा
2012 हेमेश खर्कवाल (कांग्रेस) कांग्रेस