मत्स्यपालकों को यहीं से मिलेगा बीज
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चंपावत। यहां ताड़केश्वर में स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तहत संचालित शीत जल मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने सिल्वर कार्प प्रजाति की 30 लाख से अधिक बीज की ब्रीडिंग में सफलता प्राप्त की है। अनुसंधान केंद्र में इस बार वैज्ञानिकों के सफल प्रयास से तालाबों में करीब दो माह का बीज तैयार हो गया है।
जिसे कुछ समय बाद मत्स्य पालकों को उपलब्ध कराया जाएगा। केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुरेश चंद्रा के अनुसार जहां इस वर्ष तालाबों में मलबा आने के कारण रैनबो ट्राउट प्रजाति के उत्पादन में गिरावट आई है। वहीं वैज्ञानिकों की ओर से सिल्वर कार्प प्रजाति की लाखों तादाद में ब्रीडिंग से इस कमी को पूरा कर दिया है।
उनका कहना है कि शीतजलीय मछलियां समुद्रतल से करीब 1400 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इन मछलियों का निवास विशिष्ट परिस्थितियों वाले हिमालयी क्षेत्रों में स्थित बर्फीली नदियां, नालों, झील, तालाब का साफ, ठंडा जल है।
चंपावत। अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुरेश चंद्रा के अनुसार भारत में शीतजल मछलियों की 258 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें महाशीर, असेला, रेनबो, ब्राउन ट्राउट आदि ऐसी प्रजातियां हैं जो मत्स्य पालन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में जिन स्थानों में तापमान 10 से 20 डिग्री सेल्सियस होता है, उन स्थानों में मत्स्य पालन व्यवसाय काफी विकसित हुआ है।
चंपावत। ताड़केश्वर में स्थित मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र ताड़केश्वर के वैज्ञानिकों का कहना है कि अनुसंधान केंद्र से महज 50 मीटर की दूरी पर हॉटमिक्स प्लांट लगाने के कारण भी मछलियों की विभिन्न प्रकार की प्रजातियों की ग्रोथ प्रभावित हो रही है। प्लांट के नदी के किनारे होने के कारण सारा प्रदूषित पानी अनुसंधान केंद्र के टैंकों में पहुंच कर नुकसान पहुंचा रहा है।