डांडा गांव के लोगों को बस, कार या बाइक ही नहीं, साइकिल तक देखने के लिए भी 35 किलोमीटर का पैदल सफर कर धुरा आना पड़ता है। रोड नहीं होने से यहां की जिंदगी महंगाई के बोझ से दबी हुई है। यहां रोड न होने से हर सामान पर सरचार्ज देना पड़ रहा है। 400 रुपये क्विंटल का नमक डांडा में 1060 में मिलता है। सीमेंट का 325 रुपये का कट्टा यहां पहुंचते-पहुंचते 360 रुपये भाड़े के साथ 685 रुपये का पड़ता है।
चंपावत विकासखंड के डांडा गांव की 800 की आबादी के लिए रोड या मोटर गाड़ी अंतरिक्ष जैसा सपना है। खच्चर लोगों की आवाजाही और सामान ढुलान का एकमात्र सहारा है। करीब 36 खच्चर यहां की रोजी-रोटी का जरिया हैं। एक खच्चर एक व्यक्ति के अलावा करीब 75 किलो भार ले जाता है। 35 किमी के इस मार्ग का ढुलान 600 रुपये है, जिससे नमक, गुड़, आटा, चावल, दाल सहित ज्यादातर सामानों की कीमत बाजार से 80 से 130 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। लोगों को 13 रुपये किलो खुला नमक खरीदना पड़ता है।
वहीं, अदरक, सब्जी और फलों के लिए मशहूर इस इलाके को उपज का लाभ नहीं मिल पा रहा है। रोड तक पहुंचाने के लिए भारी भाड़ा पैदावार को घाटे का सौदा बना रहा है। पशुधन यहां के लिए बेहद महत्वपूर्ण तो है, मगर पशुपालन केंद्र की व्यवस्था नहीं है। रोड नहीं होने से बिजली का कोई मतलब नहीं। प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूल जरूर है, लेकिन इससे आगे की पढ़ाई के लिए पांच किमी दूर जाने की मजबूरी है। विधायक हेमेश खर्कवाल का कहना है कि निर्माणाधीन सूखीढांग-डांडा-मीडार मार्ग की वन विभाग की अड़चनें दूर हो गई है। रोड का काम तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।
स्वास्थ्य की कोई सुविधा नहीं
स्वास्थ्य की कोई सुविधा यहां नहीं है। एक उपकेंद्र है, लेकिन उस उप केंद्र में भी पुलिस की चौकी बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि पैदल दूरी ज्यादा होने से एएनएम के दर्शन भी यदा-कदा ही होते हैं। टीकाकरण का काम भी नियमित रूप से नहीं हो पा रहा है।
टीवी, फोन कल्पना से परे
दुनिया 4-जी के दौर में पहुंच गई हो, लेकिन डांडा में संचार क्रांति का एबीसी भी अभी शुरू नहीं हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रेम सिंह बोहरा ने कहा कि यहां मोबाइल नेटवर्क शून्य है। बिजली नहीं होने से टेलीविजन की दुनिया से यहां के लोग कटे हैं। यहां के बुजुर्गों के लिए ये सब बस सपना है। यहां से बाहर जाने वाले लोग ही इन चीजों से वाकिफ हैं।
डांडा गांव की परेशानी को जिला मुख्यालय से नहीं समझा जा सकता। रोड नहीं होने से अफसरों और बड़े प्रतिनिधियों की पहुंच नहीं होती। ज्यादा भाड़े की वजह से निर्माण में लागत बढ़ जाती है। रोड से कटे इलाकों के सरकारी निर्माण कार्यों के बजट में भाड़े की वास्तविक लागत को शामिल किया जाना चाहिए। -खष्टी देवी, ग्राम प्रधान, डांडा