चंपावत। मां पूर्णागिरि धाम मेले की सरकारी अवधि में बनने वाले अस्थाई निर्माण के ठेके में हर साल भारी-भरकम रकम खर्च होती है। इस निर्माण में बीते आठ साल में ही 1.91 करोड़ रुपये से ज्यादा व्यय हो चुके हैं। अगर वन भूमि की अड़चन न होती, तो इस राशि में स्थायी निर्माण हो जाता।
हर साल अस्थाई निर्माण पर होने वाले खर्च की रकम करीब 25 लाख रुपये होती है। इसके चलते जिला पंचायत को काफी मोटी रकम हर साल इस अस्थाई निर्माण में लगानी पड़ती है।
मां पूर्णागिरि देवी के दर्शन के लिए बरसात को छोड़ नियमित रूप से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मगर धाम में श्रद्धालुओं का सैलाब मुख्य रूप से होली के तुरंत बाद शुरू होने वाले सरकारी अवधि में उमड़ता है। करीब तीन महीने तक चलने वाले मेले में 20 लाख से अधिक तीर्थयात्री उमड़ते हैं। जिला पंचायत संचालित मेले की तीन माह की अवधि के लिए जिला पंचायत, मेला मजिस्ट्रेट कार्यालय, रैनबसेरा, सफाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा, यात्रियों की सुरक्षा सहित तमाम जरूरी व्यवस्था की जाती है। इसके लिए पंचायत ऐसे तमाम विभागों के लिए आवासीय व्यवस्था के अंतर्गत करीब 21 हजार वर्ग फीट क्षेत्र में अस्थाई टिन शेड बनाती है।
आठ वर्ष में आवासीय टिन शेड में हुआ व्यय
वर्ष खर्च (लाख रुपये में)
2011 12.79
2012 15.80
2013 23.21
2014 34.60
2015 24.82
2016 24.35
2017 31.20
2018 24.42
कुल खर्च 191.22
कोट
मां पूर्णागिरि धाम का मेला क्षेत्र मुख्य रूप से आरक्षित वन क्षेत्र के दायरे में आता है। आरक्षित वन क्षेत्र होने की वजह से स्थायी निर्माण मुमकिन नहीं है। इस कारण अस्थाई निर्माण कराना मजबूरी है। पंचायत ने मेला क्षेत्र में लीज की जमीन के लिए आवेदन किया है।
भगवत पाटनी,विशेष कार्याधिकारी, जिला पंचायत।
आरक्षित वन क्षेत्र में किसी भी तरह का गैर वानिकी कार्य करना प्रतिबंधित है। इसके चलते मां पूर्णागिरि धाम मेला क्षेत्र के आरक्षित वन क्षेत्र में निर्माण कराया जाना वर्जित है।
केएस बिष्ट, प्रभागीय वनाधिकारी।