चंपावत जिले में प्रस्तावित पंचेश्वर बांध स्थल।
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भारत और नेपाल के बीच सीमा रेखा का कार्य करने वाली महाकाली नदी में प्रस्तावित बहुउद्देशीय पंचेश्वर बांध परियोजना की कवायद दिन ब दिन परवान चढ़ती जा रही है। बांध निर्माण की डीपीआर के मुताबिक पंचेश्वर बांध परियोजना के कारण बनने वाले जलाशय में 2422 हेक्टेयर वन भूमि जलमग्न होगी। हालांकि परियोजना के अंतर्गत जलमग्न होने वाले क्षेत्र में वनस्पति की कोई दुर्लभ या अनूठी प्रजाति शामिल नहीं है। लेकिन लाखों पेड़ों को पंचेश्वर बांध के लिए अपनी बलि देनी होगी। बांध के संपूर्ण डूब क्षेत्र में आने वाले वन चंपावत वन विभाग के डिवीजन के भीतर आएंगे। चंपावत के अलावा पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जिले में प्रभावित होने वाले पेड़ों की गिनती का कार्य वन विभाग की ओर से शुरू कर दिया गया है।
वाप्कोस कंपनी की ओर से तैयार की गई बांध की डीपीआर में बताया गया है कि डूब क्षेत्र में छह प्रमुख प्रकार के वन आते हैं। जिनकी विशेषता ऊष्ण कटिबंधीय आद्र पर्णपाती, ऊष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती, ऊष्णकटिबंधीय चीड़, हिमालयी आद्र समशीतोष्ण, हिमालयी शुष्क समशीतोष्ण, सहायक उच्च पर्वतीय वन और उच्च पर्वतीय वन हैं। वाप्कोस कंपनी के मुख्य प्रभारी अभियंता राहुल गौतम के अनुसार क्षेत्र के सर्वेक्षण के दौरान प्रस्तावित बांध परियोजना क्षेत्र में कुल 193 पौधों की प्रजातियां शामिल हैं। जिनमें पौधों के जड़ी बूटी वाला समूह प्रजातियों में सबसे अधिक पाया गया है। बांध निर्माण से पूर्व वनों की कटाई होने से क्षेत्र में पौधों की सफाई होगी। महाकाली नदी का जलमग्न पंचेश्वर स्थित बांध स्थल से आरंभ होकर किम्होला गांव तक फैला हुआ है, जो कि जौलजीबी में गोरी गंगा और महाकाली नदी के संगम से छह किलोमीटर क्षेत्रफल में स्थित है।
बांध निर्माण में डूब जाएंगी वनस्पतियों की 193 प्रजातियां
पौधों की प्रकृति प्रजातियों की संख्या प्रजातियों का प्रतिशत
वृक्ष 46 23.83
झाड़ियां 38 19.69
जड़ी बूटियां 63 32.64
क्लेमर्स 11 05.70
घास 29 15.03
नरकट 05 02.59
परजीवी 01 00.52
कम गोलाई के पेड़ों को शिफ्ट करने का प्रस्ताव
चंपावत। पंचेश्वर बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में आने वाले कम गोलाई के विभिन्न प्रजाति के पेड़ों को डूब क्षेत्र से अन्यत्र शिफ्ट किए जाने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है। प्रभागीय वनाधिकारी एके गुप्ता के अनुसार एक से दो फीट की गोलाई वाले खड़े पेड़ों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्रभावित क्षेत्र से उखाड़कर उन्हें अन्यत्र सुरक्षित स्थान में लगाए जाने का प्रस्ताव डीपीआर में शामिल करने के साथ शासन को भेजा गया है। यदि प्रस्ताव को हरी झंडी मिलती है तो पेड़ों को अन्यत्र शिफ्ट करने का कार्य भी शुरू कर दिया जाएगा।