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सियासत को शर्मसार कर रहे नेताओं के शब्दबाण

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चंपावत। उत्तराखंड में लोकसभा का मतदान 11 अप्रैल को पहले चरण में संपन्न हो गया लेकिन देश के अन्य हिस्सों में चुनाव प्रक्रिया अभी जारी है। चुनाव प्रचार में चल रहे शब्दों के तीर लोकतंत्र पर धब्बा लगा रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि सर्वोच्च अदालत की सख्ती के बाद चुनाव आयोग ने पहली बार देश के चार बड़े नेताओं को चुनाव प्रचार से रोका।
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, सपा नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खान पर 72-72 घंटे, केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और बसपा सुप्रीमो मायावती पर 48-48 घंटे तक चुनाव प्रचार करने पर प्रतिबंध लगाया गया। ऐसे शब्दबाणों को आम लोग भी सियासत की सेहत के लिए कतई ठीक नहीं मानते हैं।

मौजूदा राजनीति में राजनीतिक दल मुद्दों को लेकर संजीदा नहीं हैं। जब सियासत में मुद्दों से भागने की होड़ हो तो सियासी शब्द समझदारी से दूर हो जाते हैं। इकबाल कुरैशी चंपावत।
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>> राजनीतिक दल अब जनता और जन सरोकारों से कट रहे हैं। लोगों से बढ़ता फासला उन्हें जनता के मुद्दों से दूर कर शब्दों की मर्यादा को लांघने को मजबूर कर रहा है। डॉ. प्रकाश जोशी शूल चंपावत।
>> सत्ता पक्ष हो या प्रतिपक्ष तमाम राजनीतिक दलों के पास अपने किए हुए कार्यों के बारे में बताने के लिए कुछ खास नहीं है। ऐसी हालत में लोगों को भ्रमित करने के लिए नेता बेढंगे शब्दजाल गढ़ रहे हैं। गिरीश नरियाल चंपावत।
>> राजनीतिक दल और नेता न वादें पूरा करते हैं और न ही घोषणापत्र में कही बातों को गंभीरता से लेते हैं। उपलब्धियों के खाते में शून्यता से नेता इस तरह से बोल रहे हैं। दीवान सिंह बोहरा
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