चंद शासनकाल से चली आ रही है आशीष देने की परंपरा
चाराल क्षेत्र के गांवों में घर घर जाकर दी जाती है सभी को आशीष
सबसे जुदा अंदाज में गाई जाती है काली कुमाऊं की खड़ी होली
ऐतिहासिक विरासत को भी सहेज रही है खड़ी होली गायन की परंपरा
सतीश जोशी ‘सत्तू’
चंपावत। काली कुमाऊं के नाम से विख्यात चंपावत जिला मुख्यालय और आसपास के चाराल क्षेत्र में खड़ी होली गायन की परंपरा ऐतिहासिक विरासत को सहेजने का काम भी कर रही है। चाराल क्षेत्र में आज भी चंद शासनकाल से होली पर्व पर आशीष देने की परंपरा चली आ रही है। जिसमें होली के छरड़ी पर्व पर चाराल क्षेत्र के गांवों में घर-घर जाकर सभी लोगों को सुखी और समृद्ध रहने की आशीष दी जाती है। गौरवशाली इतिहास समेटे पहाड़ की होली का ऐसा रंग काली कुमाऊं में ही देखा जाता है। ढोल और झांझर की गुंजार तथा विभिन्न रागों के प्रवाह पर झूमने के साथ आशीष देने वाली होली में गौरवशाली इतिहास का वर्णन होता है तो होल्यार भी इसके रंग में रंग जाते हैं।
इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार चंपावत जिला मुख्यालय को अतीत से ही सांस्कृतिक नगरी का दर्जा मिला हुआ है। यहां चंद शासकों ने सातवीं सदी से लेकर 16 वीं शताब्दी तक शासन किया था। उस दौर में जहां चाराल क्षेत्र में चौबे होली गायन की प्रतियोगिता होती थी। वहीं रंगभरी होली खेलने के बाद घर घर जाकर आशीष देने की होली खेली जाती थी। जिसमें सभी होल्यार पूरे साल भर में की गई गलतियों के लिए क्षमायाचना करते हुए एक दूसरे के सुख संपन्नता की कामना करते हैं। काली कुमाऊं क्षेत्र में खड़ी होली गायन का इतिहास 400 साल से ज्यादा पुराना माना जाता है। प्रसिद्ध रंगकर्मी राजेंद्र गहतोड़ी बताते हैं कि खड़ी होली में ढोल की थाप के साथ कदमों की चहल कदमी और राग-रागिनियों का समावेश होता है। कुमाऊं मंडल के चंपावत, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों में आयोजित की जाने वाली होली में राग दादरा और राग कहरवा में रामायण और महाभारत काल की गाथाओं का वर्णन किया जाता है।
फोटो 01 सीपीटी 13 पी
इनसेट.......
अब मैदानी क्षेत्र की तरह एक दिन में सिमट रही है होली
चंपावत। जिले के पर्वतीय क्षेत्र में कभी हफ्ते दस दिन तक मनाया जाने वाला होली का पर्व अब मैदानी क्षेत्रों की तरह ही एक ही दिन में सिमटने लगा है। वरिष्ठ होल्यार अमर सिंह, राजेंद्र सिंह, मनोज कुमार, ललित मोहन आदि का कहना है कि पिछले कुछ सालों में रीति रिवाजों और परंपराओं पर आए बदलाव का असर होली त्यौहार पर भी नजर आ रहा है। अब एकादशी से मचने वाली होली की धूम केवल छरड़ी के दिन तक सिमटने लगी है।
बाक्स
छरड़ी के दूसरे दिन होता है टीके की होली का गायन
चंपावत। अन्य स्थानों में जहां छरड़ी और आशीष देने की होली के बाद होली गायन बंद हो जाता है। वहीं पर्वतीय स्थानों में छरड़ी के अगले दिन टीके की होली का गायन किया जाता है। टीके के दिन गांव के मंदिर अथवा सार्वजनिक स्थल में वेदांती होलियों का गायन किया जाता है।