पसंदीदा स्थल
वास स्थल के तौर पर गौरैया पसंदीदा जगहों (माइक्रो हैबीटेड) का अध्ययन किया गया। इसमें पहले नंबर पर कूड़े वाली जगह है। कूड़े वाली जगह पर छोटे-छोटे कीड़े खाने के लिए मिलते है। इसके अलावा छोटी झाड़ियों वाली जगह और तीसरा लोगों के निजी गार्डन है। चौथे नंबर पर परचून की खुली दुकान है, जहां उनकी संख्या अधिक दिखती है। इन दुकानों में अन्न बिखरे रहते हैं, जिनसे उनको खाना मिल जाता है। अगर शहर और गांव में संख्या की बात करें तो शहरों (देहरादून, हरिद्वार, रुद्रपुर, हल्द्वानी के अलावा 10 अन्य शहर अध्ययन किया गया) में गांव तुलना में दो तिहाई कम गौरैया मिली हैं।
ये भी पढ़ें...Snowfall: बदरीनाथ धाम में दो फिट तक जमी बर्फ, लगातार बर्फबारी, 25 मार्च तक के लिए जानें मौसम की भविष्यवाणी
ऊंचाई वाली जगहों से सर्दियों में माइग्रेट करती गौरैया
शोधार्थी रेणु बताती हैं कि 0 से 1000 मीटर, 1000 से 2000 मीटर और 2000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले तीन क्षेत्रों में मिलने वाली गौरेया के बारे में अध्ययन किया गया। इसमें पता चलता है कि 3000 मीटर या उसे ऊंचाई पर मिलने वाली गौरेया में उस क्षेत्र में रहने के लिए कई गुण हैं, जो कि नीचे के क्षेत्रों में मिलने वाली गौरैया में नहीं है। नीचे के क्षेत्रों में मिलने वाली गौरैया में हीमोग्लोबीन 18 ग्राम प्रति डेसीलीटर होता है, जबकि ऊंचाई में मिलने वाली गौरैया में 21 ग्राम प्रति डेसीलीटर होता है। खून की अधिक मात्रा उसे ऊंचाई वाले क्षेत्र में हाईपोक्सिया से बचाता है और शरीर में आक्सीजन की कमी नहीं होने देता है। इसके उड़ने वाले पंखों की लंबाई भी अधिक होती है। साथ ही सर्दी से बचाव के लिए सीने और पृष्ठ भाग में पंख भी अधिक लंबे होते हैं। ऊंचाई वाले स्थलों में रहने वाली गौरेया सर्दियों में माइग्रेट कर नीचे वाले स्थानों पर भी आती है।