पंच प्रयागों में से एक कर्णप्रयाग में स्थित भगवान कर्ण का पौराणिक मंदिर बदहाली से गुजर रहा है। यहां कहने को सफाई केवल दो दिन ही हो पाती है।
यहां रास्ते क्षतिग्रस्त हैं और देखरेख के अभाव में झाड़ियां उग आई हैं। रंगरोगन भी नहीं होता। शासन और प्रशासन की ओर से मंदिर की उपेक्षा की जा रही है।
अलकनंदा और पिंडर नदी का यह संगम स्थल 2013 की आपदा से क्षतिग्रस्त है। नगरपालिका प्रशासन और शासन स्तर से पौराणिक धरोहरों की लगातार उपेक्षा की जा रही है।
कर्ण मंदिर के पुजारी जगदीश प्रसाद ड्यूंडी ने बताया कि नगरपालिका प्रशासन की ओर से सप्ताह में एक दो दिन ही मंदिर की सफाई की जाती है। जितना संभव हो पाता है वे स्वयं ही मंदिर परिसर की सफाई करते हैं।
कहा कि उन्होंने शासन और नगर पालिका प्रशासन से पौराणिक कर्ण मंदिर को पर्यटन और तीर्थाटन से जोड़ने की पहल करने और मंदिर के सुंदरीकरण और बदहाल पड़े संगम स्थल को सही करने की मांग की है। नगरपालिका अध्यक्ष सुभाष गैरोला ने बताया कि कर्ण मंदिर के सुंदरीकरण का प्रस्ताव बनाकर पर्यटन विभाग को दिया गया है। मंदिर में पालिका की ओर से शीघ्र रंग-रोगन किया जाएगा।