आपदा का सांप गुजर जाने के बाद राहत की लकीर पीटने वाली सरकारें अगर सचेत होती तो उत्तराखंड में आपदाओं की संख्या कम होती और जन-धन की हानि भी न्यूनतम होती। सरकारों ने वैज्ञानिकों रिपोर्टों और सुझावों पर ध्यान ही नहीं दिया।
उत्तराखंड की पल-पल की खबर मिलेगी यहां
सबकुछ भगवान भरोसे ही रहा। नतीजा सबके सामने है। अब सवाल यह उठता है कि सरकार इस भीषण आपदा से कोई सबक सीखती है अथवा फिर इसकी अनदेखी करके सबकुछ भगवान के ही भरोसे छोड़ देगी।
कई दिनों से बंद है गंगोत्री हाईवे
धार्मिक के साथ सामरिक महत्व वाला गंगोत्री हाईवे 16 दिनों से उत्तरकाशी से लेकर सुक्की तक 65 किमी हिस्सा भूस्खलन से अवरुद्ध है। यह स्थिति कुदरत से कहीं ज्यादा सरकारी चूक की वजह से है। देश के चोटी के दो शीर्ष संस्थानों ने सर्वेक्षण कर केंद्र और राज्य सरकार को इस हाईवे के कई हिस्सों में भूस्खलन के खतरों से आगाह किया था।
इसके असर कम करने के उपाय सुझाने वाली रिपोर्ट भी समय पर सौंप दी थी। लेकिन इस रिपोर्ट को दरकिनार कर सरकारों ने यहां तीर्थयात्रा तथा स्थानीय जनजीवन को खतरे में डालने का काम किया।
2001 में हुआ था सर्वेक्षण
पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट की पहल पर वर्ष 2001 में केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान इसरो की अगुवाई में उत्तरकाशी गंगोत्री क्षेत्र में भूगर्भीय हलचलों का सर्वेक्षण कराया था। इसमें संस्थान ने उत्तरकाशी, मनेरी, भटवाड़ी, गंगनानी, डबराणी, सुक्की तथा गंगोत्री गोमुख क्षेत्र में भूस्खलन के खतरों को चिह्नित किया था।
रिपोर्ट में खतरों को कम करने के उपाय भी सुझाए गए थे। वर्ष 2010 में राजमार्ग से जुड़े भटवाड़ी कस्बे में हुए भूस्खलन में आधा गांव और बाजार तबाह हो गया था। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने एक वर्ष तक अध्ययन के बाद रिपोर्ट पिछले वर्ष सरकार को सौंप दी थी।
रिपोर्ट में भविष्य में इस क्षेत्र में भारी भूस्खलन की ओर इशारा किया गया था।
रिपोर्ट में भूस्खलन का असर कम करने के लिए गांव तथा बाजार क्षेत्र से जल निकासी का उचित प्रबंधन भागीरथी की ओर से भटवाड़ी में रिटेनिंग वाल देने तथा नए निर्माण और भूस्खलन क्षेत्र में रह रहे लोगों को वहां से हटाने की सिफारिश की गई थी।
बाजार का बजूद खतरे में
आज स्थिति यह है कि न कहीं रिटेनिंग वाल लगी और न ही जल निकासी का प्रबंधन किया गया। इस लापरवाही से केभटवाड़ी गांव तथा बाजार का वजूद ही खतरे में पड़ गया। तहसील कार्यालय तो शिफ्ट कर दिया, लेकिन भू धंसाव की चपेट में आ रहे इस कस्बे को बचाने के लिए कोई उपाय नहीं किए गए।
यही स्थिति गंगोत्री हाईवे के हर्षिल की ओर जाने वाले हिस्सों की भी है।
संस्थान ने पिछले वर्ष ही राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंप दी थी। इसमें हाईवे से जुड़े भटवाड़ी कस्बे में रिटेनिंग वॉल तथा जल निकासी का उचित प्रबंधन करने की सिफारिश की गई थी। भूस्खलन के असर को काम करने के उपाय न होने की दशा में हाईवे के इस हिस्से को बचाना मुश्किल हो सकता है।
- एसके त्रिपाठी, निदेशक भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग