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घायल धावक गरिमा ने दिल्ली में फिर जीती व्हील चेयर दौड़

Tue, 04 Dec 2018 12:28 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, रानीखेत (अल्मोड़ा)।
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पुरस्कार लेती घायल धाविका गरिमा जोशी। - फोटो : अमर उजाला
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जज्बा हो तो कोई भी दिक्कत आड़े नहीं आती है, इसे सच कर दिखाया है उत्तराखंड की घायल धावक गरिमा जोशी ने। गरिमा जोशी का दिल्ली स्थित स्पाइनल इंजरी सेंटर में उपचार चल रहा है, सफदरजंग अस्पताल की ओर से आयोजित एक किमी की व्हील चेयर दौड़ में गरिमा ने पहला स्थान प्राप्त किया है, लेकिन विडंबना यह है कि गरिमा के उपचार के लिए अब प्रदेश सरकार ने अपने हाथ खींच लिए हैं। पिता का आरोप है कि सरकार ने होनहार धावक को अधर में लटका दिया है, जबकि गरिमा की माता भी कैंसर रोग के कारण जिंदगी और मौत से जूझ रही है।
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बता दें कि बंगलूरू में मैराथन दौड़ के लिए गईं प्रदेश की धावक गरिमा जोशी को अभ्यास के दौरान इसी साल 31 मई को एक अज्ञात वाहन ने टक्कर मारकर घायल कर दिया था। गरिमा की रीढ़ की हड्डी बुरी तरह फ्रैक्चर हो गई थी और पैरों ने काम करना बंद कर दिया था। पहले उसका उपचार कर्नाटक मणिपाल अस्पताल में चला। इसके बाद वह दिल्ली स्पाइनल इंजरी सेंटर में उपचार करा रही है। प्रदेश सरकार ने गरिमा के उपचार का खर्च उठाने का आश्वासन दिया था। पिता पूरन जोशी का आरोप है कि सरकार ने 13.10 लाख रुपये देकर अब आगे के उपचार के लिए हाथ खड़े कर दिए हैं। जबकि गरिमा अभी भी वहां व्हील चेयर के सहारे है, अभी उसके उपचार में काफी धन खर्च होना है। इधर, गत दिवस सफदरजंग अस्पताल की ओर से आयोजित व्हील चेयर मैराथन दौड़ में गरिमा ने पहला स्थान प्राप्त किया है। उन्हें सफदरजंग अस्पताल के मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. राजेंद्र शर्मा ने सम्मानित किया है। गरिमा में दौड़ को लेकर गजब का जज्बा है। घायल होने के बावजूद वह प्रतियोगिताओं में अव्वल आकर क्षेत्र का नाम भी रोशन कर रही हैं।
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पिता बोले, मां-बेटी दोनों के उपचार का आश्वासन दिया था सरकार ने 
रानीखेत। गरिमा जोशी की माता आशा जोशी भी कैंसर से जूझ रही हैं। सफदरजंग अस्पताल के कैंसर वार्ड में उनका उपचार चल रहा है। पिता पूरन जोशी का आरोप है कि सरकार ने मां और बेटी दोनों का खर्च वहन करने का आश्वासन दिया था, लेकिन अब वह अपने वायदे से मुकर गई है। वह स्वयं बेरोजगार हैं। वह इन हालातों में कैसे मां-बेटी का उपचार कराएं। सरकार ने यदि पूरा उपचार नहीं करना था तो कोरे वायदे नहीं करने चाहिए थे। इस मामले में न तो मुख्यमंत्री सुनने को राजी हैं और न मंत्री।  
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