इंटरनेट के इस दौर में एक ओर दुनिया फोर जी टेक्नालॉजी और बातचीत के लिए वीड़ियो कालिंग की सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। वहीं बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिले की रामगंगा घाटी ऐसा क्षेत्र है जहां आज तक मोबाइल टावर नहीं लगा है। हालात यह हैं कि यहां के लोगों को अपने परिजनों से बातचीत करने के लिए पहाड़ों में चढ़कर सिग्नल आने का इंतजार करना पड़ता है।
बागेश्वर जिले के रातिरकेठी, मल्खाडुंगर्चा, गोगिना, कीमू, कापड़ी और पिथौरागढ़ के नामिक, होकरा, खोयम व गोला ऐसे इलाके हैं जहां आज भी संचार सुविधाओं का अभाव है। ग्रामीणों के पिछले पांच-छह वर्षों से मांग करने के बाद भी इस क्षेत्र में न तो बीएसएनएल और न ही निजी कंपनियों ने मोबाइल टावर लगाए। हालात यह हैं कि लोगों के मोबाइल फोन शोपीस बनकर रह गए हैं। कुछ लोगों के पास महंगे मोबाइल सेट भी हैं लेकिन सिग्नल नहीं आने से या तो लोग इनमें गाने सुनते हैं या फिर फिल्में देखते हैं।
किसी परिजन से बातचीत करनी हो तो उन्हें घरों से निकलकर आसपास की ऊंची पहाड़ियों पर चढ़ना होता है। सिग्नल आने पर बातचीत होती है या फिर कई बार बिना बातचीत पूरी किए ही घरों को लौटना पड़ता है। रामगंगा घाटी क्षेत्र कहे जाने वाले इस इलाके में लगभग 12 हजार से अधिक की आबादी निवास करती है। इन गांवों के अधिकांश युवा सेना में तैनात हैं। परंतु संचार सेवाएं नहीं होने से परिजनों से बातचीत भी नहीं कर सकते हैं। उन्हें संचार क्रांति के इस दौर में भी चिट्ठी भेजनी पड़ती है। क्षेत्र के सेना से रिटायर्ड कैप्टन चतुर सिंह ने बताया कि बच्चे, युवा तो अपने रिश्तेदारों से संचार संपर्क के लिए ऊंचाई वाले स्थानों पर चले जाते हैं लेकिन बुजुर्ग सीमा पर तैनात अपने बेटे से बातचीत के लिए भी तरसते हैं।
फोन सुविधा नहीं होने से समय पर किसी घटना की सूचना नहीं मिल पाती है। उन्होंने बताया कि मोबाइल टावर लगाने के लिए क्षेत्र की जनता लगातार मांग कर रही है परंतु आज तक उनकी मांग को नहीं सुना गया है। अब दोनों जिलों के पंचायत प्रतिनिधियों ने रामगंगा घाटी संयुक्त संघर्ष संगठन बनाया है इस संगठन के माध्यम से मोबाइल टावर लगाने के लिए संघर्ष किया जाएगा।