राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्र में भेड़ पालन और ऊन उत्पादन के परंपरागत कारोबार को बचाने के लिए शुरू की गई भेड़ नस्ल सुधार योजना अगले साल तक ग्रामीणों के बीच पहुंच जाएगी।
सरकारी फार्म में कश्मीर की मैरीनो और आस्ट्रेलिया की रैंबुलेट भेड़ के प्रजनन का प्रयोग सफल हो गया है। अब अगले साल से गांवों में किसानों की भेड़ों पर इन नस्लों का प्रजनन आरंभ हो जाएगा। सरकार की मंशा के अनुसार भेड़ और ऊन विकास बोर्ड ने तैयारियां शुरू कर दी हेैं।
उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में भेड़ पालन और ऊन उत्पादन के परंपरागत व्यवसाय को बचाने के लिए दो साल पहले सरकार ने ऊन और भेड़ विकास बोर्ड की स्थापना की। मुख्यमंत्री ने पशु पालन विभाग को भेड़ों की नस्ल सुधार करने के निर्देश दिए।
इसके बाद उत्तराखंड के पशु चिकित्सकों और विशेषज्ञों की राय पर आस्ट्रेलिया से रैंबुलेट नस्ल की 150 और कश्मीर से मेरीनो नस्ल की 50 भेड़ें राज्य में लाई गईं। इनमें कुछ मादा भेड़ें शामिल थीं। भेड़ों को बागेश्वर जिले के शामा स्थित भेड़ प्रजनन केंद्र में भेजा गया।
मेरीनो और रैंबुलेट भेड़ों की मदद से स्थानीय भेड़ों में प्रजनन कराकर नई उन्नत नस्ल तैयार करने के लिए प्रयोग शुरू किए गए। अभी तक शामा में प्रयोग के दो चरण संपन्न हुए हैं। पहले चरण के प्रजजन से 21 मेमने और दूसरे चरण में तीन मेमने प्राप्त हो चुके हैं।
पहले चरण के मेमनों की आयु एक साल से अधिक हो चुकी है। शामा स्थित भेड़ प्रजनन केंद्र के प्रभारी डा. कुमार सुबोध रंजन ने बताया कि प्रयोग सफल हो गए हैं। प्रजनन से पैदा हुई नई नस्ल को अभी तक शामा नाम दिया गया है। बाद में स्थायी नामकरण होगा।
फार्म की सफलता के बाद अगले साल से किसानों की भेड़ों में भी आस्ट्रेलियाई और कश्मीरी भेड़ों से प्रजनन कराया जाएगा। अगले साल के शुरुआती महीनों से नस्ल सुधार की योजना धरातल पर उतर जाएगी। अधिकारियों ने बताया कि उत्तराखंड के बागेश्वर, पिथौरागढ़, चमोली उत्तरकाशी, टिहरी में भेड़ों की नस्ल सुधार का कार्यक्रम चलेगा।
पशु चिकित्सकों का कहना है कि रैंबुलेट और मैरीनो नस्ल की भेड़ें उत्तराखंड की परंपरागत भेड़ों से अधिक गठीली होती हैं। इनकी ऊन सर्वोच्च कोटि की, अधिक बारीक, मुलायम होती हैं। साल में दो या अधिक मैमने पैदा करती हैं। इनमें चरने के लिए काफी दूर तक जाने की क्षमता होती है।
वहीं राज्य सरकार ने बागेश्वर, पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी जिले में चार सचल चिकित्सा सेवाएं शुरू करा दी हैं। इनमें पशुओं के कृत्रिम गर्भाधान की भी सुविधा है। इसका उद्देश्य उच्च हिमालयी क्षेत्र में पशुपालकों को पशुओं के उपचार की आधुनिक सुविधाएं घर पर ही सुलभ कराना है।
बागेश्वर जिले में मोबाइल चिकित्सा वाहन पशुपालन विभाग के शामा स्थित भेड़ प्रजनन केंद्र को सौंपा गया है। वहीं से सचल चिकित्सा सेवा का संचालन होगा। सचल अस्पताल में पशुओं के उपचार सहित ऑपरेशन, परीक्षण, कृत्रिम गर्भाधान की सुविधाएं हैं।
यह वाहन जिले के विभिन्न हिस्सों में जाकर पशुओं का उपचार करेगा। उपचार आदि का कार्य स्थानीय डॉक्टर करेंगे। उन्होंने बताया कि ऐसे वाहन चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ में भी उपलब्ध कराए गए हैं।