जिस किलमोड़ा के पौधों को कंटीली झाड़ी कहकर पहाड़ में उपेक्षित छोड़ दिया जाता है, उसी से दुनियाभर में जीवन रक्षक दवाएं तैयार हो रही हैं। जड़ी-बूटी के उत्पादन व संरक्षण में जुटे बागेश्वर के एक ग्रामीण ने किलमोड़े की इन्हीं झाड़ियों से तेल तैयार किया है। खास बात यह है कि शुद्धता के कारण यह तेल लखनऊ की दवा बनाने वाली एक कंपनी को बेहद पसंद आया है।
वनस्पति विज्ञान में बेरवेरीज एरिस्टाटा को पहाड़ में किलमोड़ा के नाम से जाना जाता है। इसकी करीब 450 प्रजातियां विश्व में पाई जाती हैं। भारत, नेपाल, भूटान और साउथ-वेस्ट चाइना सहित अमेरिका में भी इसकी प्रजातियां हैं। किलमोड़ा का पूरा पौधा औषधीय गुणों से भरपूर है। इसकी जड़, तना, पत्नी, फूल और फलों से विभिन्न बीमारियों में उपयोग आने वाली दवाएं बनाई जाती हैं। मुख्य रूप से इस पौधे में एंटी डायबिटिक, एंटी ट्यूमर, एंटी इंफ्लेमेटरी, एंटी बैक्टीरियल, एंटी वायरल तत्व पाए जाते हैं। शुगर रोग में इसका सबसे अधिक उपयोग होता है। जीवन रक्षक होने के बावजूद पहाड़ में अधिकांश लोग इसे कंटीली झाड़ियों के अलावा कुछ नहीं समझते हैं।
कुछ जानकार लोग ही इसका बीमारियों में उपयोग करते हैं। इन्हीं में शामिल जिले के खलझूनी गांव निवासी 72 वर्षीय भागीचंद्र टाकुली हैं। भागीचंद्र ऐसे व्यक्ति हैं, जो पिछले डेढ़ दशक से हिमालयी जड़ी-बूटियों के संरक्षण में जुटे हैं। हाल ही में भागीचंद्र ने नाप भूमि में लगाए गए किलमोड़ा के पौधे से तेल तैयार किया है। उन्होंने बताया कि करीब सात किलो किलमोड़ा की लकड़ियों से दो सौ ग्राम तेल तैयार हुआ। इस तेल को लखनऊ में दवा बनाने वाली एक कंपनी ने बेहद पसंद किया है। जड़ी-बूटी के जानकार भानी चंद्र ने बताया कि दवाइयों के लिए सबसे अधिक किलमोड़ा का कच्चा तेल हिमाचल प्रदेश से ही भेजा जाता है।
आसानी से तैयार होने वाले एक लीटर तेल से उत्पादक को लगभग छह सौ रुपये मिलते हैं। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में लोगों को इसके महत्व की जानकारी नहीं है। यदि नाप भूमि में लोग किलमोड़ा उगाए तो हजारों परिवार लाभान्वित हो सकते हैं। भेषज संघ के माध्यम से ही जड़ी-बूटी का उत्पादन और व्यापार किया जा सकता है। इससे रोजगार की तरह अपनाने से पलायन पर भी रोक लग सकती है। अपनी भूमि में सैकड़ों प्रकार की जड़ी-बूटी की खेती कर रहे भागीचंद्र ने बताया कि किलमोड़ा सहित अन्य उपयोगी जड़ी-बूटी की खेती के लिए क्षेत्र के लोगों को जागरूक किया जाएगा। लखनऊ से लौटे भागीचंद्र ने बताया कि जल्दी ही दवा कंपनी की एक टीम खलझूनी का दौरा करेगी। लखनऊ की डॉ. सहाय लेबोरेटरी ने विशेष रूप से पसंद किया है। लेबोरेटरी के केमिस्ट भास्कर अस्थाना ने बताया कि बागेश्वर के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कई प्रकार की जड़ी-बूटियां, औषधीय पादप हैं। भागीचंद्र जड़ी बूटी उत्पादन में अच्छा प्रयास कर रहे हैं। कंपनी का उद्देश्य भी ऐसे उत्पादकों को प्रोत्साहित करना है।