बागेश्वर में मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर जब सरयू और गोमती की लहरें उत्तरायणी मेले के स्वागत में हिलोरें मार रही हैं, तब एक सवाल हर मन में है कि क्या यह मेला केवल व्यापार और मनोरंजन का मंच है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि यह संगम उत्तर और मध्य हिमालय के बीच के उस इश्क और ईमान का गवाह है जिसे हम राजुला मालूशाही के नाम से जानते हैं।
अक्सर लोकगाथाओं को कपोल - कल्पना मान लिया जाता है, लेकिन राजुला मालूशाही के मामले में इतिहास मौन नहीं है। कत्यूरी राजवंश के राजकुमार मालूशाही और जोहार की राजुला का अस्तित्व ठोस दस्तावेजों में दर्ज है। पुराने समय में राजुला का जोहार से बागेश्वर आना और फिर मालूशाही का जोगी बनकर तिब्बत हूणदेश की दुर्गम चोटियों को पार करना, पहाड़ की जीजीविषा का प्रतीक था। तब उत्तरायणी मेला वह पड़ाव था जहां साल भर के संदेशों का आदान-प्रदान हुड़के की थाप पर होता था। आज स्वरूप बदल चुका है। जहां कभी नमक, सुहागा और पश्मीने का व्यापार रिश्तों की नींव डालता था, वहां अब ग्लोबल ब्रांड्स और उपभोक्तावाद का कब्जा है।
राजुला का वह विरह अब लाउडस्पीकर के शोर में कहीं दब गया है। यह दिन उस वचन को याद करने का है जो सदियों पहले इसी संगम पर लिया गया था। राजुला- मालूशाही की कहानी केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि शौका संस्कृति और कत्यूरी वैभव का संगम थी।
राजुला और मालूशाही की प्रेम कहानी की शुरूआत का उत्तरायणी मेले में बागनाथ मंदिर से हुई इसका जिक्र लोकगाथाओं में भी मिलता है। दोनों राजाओं ने बागनाथ मंदिर में संतान प्राप्ति के लिए मन्नत मांगी थी। और संतान होने पर आपस में विवाह का प्रण लिया था। ऐसा लोकगाथाओं और लोकगीतों में वर्णन मिलता है।-चारू तिवारी, सोशल एक्टिविस्ट, स्वतंत्र पत्रकार और लेखक