बागेश्वर। पिंडारी और सुंदरढूंगा ग्लेशियरों की तलहटी में उगने वाला एक छोटा नारंगी फल पहाड़ की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की क्षमता रखता है लेकिन यह अब भी जंगलों तक सीमित है। स्थानीय भाषा में बण चूक और वैज्ञानिक तौर पर सी बकथॉर्न के नाम से पहचाना जाने वाला यह सुपरफूड चीन में करोड़ों का कारोबार खड़ा कर चुका है।
उच्च हिमालयी क्षेत्रों के अधिक पानी वाले भाग में उगने वाला यह जंगली फल ग्लेशियरों की तलहटी में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। छोटे, गोल और चमकीले नारंगी रंग के इस फल का उपयोग जूस, शरबत, चाय और औषधीय तेल बनाने में किया जाता है। इसे लेह बेरी, लद्दाख बेरी और हिमालयन बेरी के नाम से भी जाना जाता है। पूर्व डीएफओ बलवंत सिंह शाही बताते हैं कि चीन इस फल का सबसे बड़ा उत्पादक और प्रोसेसर है। वहां इसका वार्षिक टर्नओवर 1200 करोड़ रुपये से अधिक है। उत्तराखंड में भी करीब 700 किसानों को इसकी व्यावसायिक खेती का प्रशिक्षण दिया जा चुका है लेकिन जिले में अभी तक बड़े स्तर पर पहल नहीं हो पाई है।
इसलिए है खास
आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. एजल पटेल के अनुसार सी बकथॉर्न पोषक तत्वों का भंडार है। इसमें विटामिन सी की मात्रा आंवला, संतरा, कीवी और नींबू से अधिक होती है जबकि विटामिन ई, ए और ओमेगा फैटी एसिड भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर यह फल इम्यूनिटी बढ़ाने, हृदय स्वास्थ्य सुधारने, पाचन तंत्र मजबूत करने, फैटी लीवर की समस्या कम करने और घाव भरने में सहायक माना जाता है। इसका तेल त्वचा के लिए भी बेहद उपयोगी बताया जाता है, इसी कारण इसे सुपरफूड की श्रेणी में रखा गया है।
व्यावसायिक खेती की जरूरत
कपकोट क्षेत्र के जातोली निवासी कपिल दानू बताते हैं कि गांव के लोग जंगल से बण चूक के फल तोड़कर लाते हैं और उससे जूस बनाते हैं। स्थानीय स्तर पर यह जूस 250 रुपये प्रति लीटर तक बिकता है। इसके बावजूद ग्रामीणों को इसकी व्यावसायिक खेती और बड़े बाजार की संभावनाओं की पर्याप्त जानकारी नहीं है जिससे यह फल अभी तक सीमित दायरे में ही उपयोग हो रहा है।
कोट
सी बकथॉर्न की व्यावसायिक खेती के लिए जिले में प्रयास किए जाएंगे। इसके लाभ लेने वाले किसानों की जानकारी जुटाकर उन्हें प्रशिक्षण देने का प्रयास किया जाएगा। संबंधित विभागों के साथ इसके प्रचुर उत्पादन और विपणन की कार्ययोजना बनाई जाएगी। -आकांक्षा कोंडे, डीएम, बागेश्वर