फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

काफी बदल गया है प्रसिद्ध उत्तरायणी मेले का स्वरुप

विज्ञापन
बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में निकली शोभायात्रा में भोकरे बजाते कलाकार। - फोटो : BAGESHWAR
विज्ञापन
बागेश्वर। यहां के उत्तरायणी मेले का स्वरूप धीरे-धीरे बदल रहा है। केबल, टीवी के जरिये पश्चिमी संस्कृति घर-घर में प्रवेश कर चुकी है। आधुनिकता की अंधी दौड़ का कुप्रभाव मेले के पारंपरिक और सांस्कृतिक स्वरूप पर भी पड़ा है। यदि मेले के पौराणिक और सांस्कृतिक स्वरूप को बचाने के प्रयास नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी के लिए यह मेला सिर्फ कहानी बनकर रह जाएगा।
विज्ञापन

मकर संक्रांति पर हर साल सरयू बगड़ में लगने वाला पौराणिक और ऐतिहासिक उत्तरायणी मेला अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। पांच दशक पहले की बात करें तो उत्तरायणी मेले में दानपुर, दुग नाकुरी, गरुड़ के कत्यूर की चांचरी की मधुर गूंज कर्णप्रिय लगती थी। इन क्षेत्रों के गायक कलाकार बेहतर तरीके से चांचरी गाते थे। कपकोट के गोगिना गांव से आए बहादुर सिंह बताते हैं कि नुमाइशखेत में तब झोड़ा और चांचरी की गूंज रहती थी, लेकिन अब मेले में ऐसा नजारा कमोबेश देखने को नहीं मिलता है। आज पारंपरिक वेशभूषा में न तो दानपुर की महिलाएं आती हैं और न ही सांस्कृतिक कार्यक्रम।
×
सभाओं में खूब होती है राजनीति
बागेश्वर। उत्तरायणी मेले के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए सरयू नदी तट पर राजनीतिक दलों की सभाएं करने की परंपरा आज भी है। मकर संक्रांति पर 15 जनवरी को सरयू नदी तट पर राजनीतिक दलों की सभाएं होंगी। ये सभाएं अब राजनीति का अखाड़ा बन गई हैं।
विज्ञापन

×
जुलूस का स्वरूप बदला
बागेश्वर। उत्तरायणी मेले में मंगलवार को निकला सांस्कृतिक जुलूस में पिछले साल की तुलना में कई कमियां नजर्र आइं। पिछले साल जुलूस में मोतिया बल्द, पुरुषों, महिला, बच्चों की होली की झांकी थी। इस बार ये नहीं दिखे। पिछले साल मेले में दो याक पहुंचे थे। लोगों ने इनकी सवारी का आनंद उठाया लेकिन इस बार याक नहीं पहुंचे। पिछली बार ड्रोन से फोटोग्राफी हुई थी लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें