बागेश्वर। जिला न्यायालय ने दीवानी मामलों में देनदारों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला कानूनी फैसला सुनाया है। जिला जज पंकज तोमर की अदालत ने निचली अदालत की ओर से एक युवक के खिलाफ जारी किए गए गिरफ्तारी वारंट को निरस्त कर दिया है। माननीय न्यायालय ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि बिना ऋणी (देनदार) की वास्तविक आर्थिक क्षमता की जांच किए उसे सीधे जेल भेजने का आदेश पारित करना न्यायसंगत नहीं है और यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है।
मामले के अनुसार प्रताप सिंह शाही ने देनदार पंकज सिंह चौहान (निवासी गडेरा) से न्यायालय के फैसले के तहत तय हुई 6.70 लाख रुपये की राशि वसूलने के लिए सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में एक निष्पादन वाद दाखिल किया था। इस मामले में देनदार पंकज सिंह चौहान ने पैसों का प्रबंध करने के लिए अदालत से कुछ समय की मोहलत मांगी थी।
निचली अदालत ने तीन जून को पंकज का प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया और उनके खिलाफ सीधे गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया। इस आदेश के खिलाफ पंकज सिंह ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से जिला जज की अदालत में दीवानी निगरानी याचिका दायर की।
मामले की गहन सुनवाई के बाद जिला जज पंकज तोमर ने पाया कि निचली अदालत ने देनदार की भुगतान क्षमता और उसकी व्यावहारिक कठिनाइयों का आकलन किए बिना ही गिरफ्तारी का आदेश जारी करने की चूक की थी।
अदालत की टिप्पणी...
जिला जज ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि केवल डिक्री (फैसले की राशि) का भुगतान न कर पाना किसी व्यक्ति को सिविल कारागार (जेल) भेजने का पर्याप्त आधार नहीं है। जब तक यह साबित न हो जाए कि ऋणी के पास भुगतान के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं और वह जानबूझकर व दुर्भावनापूर्वक भुगतान करने से बच रहा है, तब तक उसकी व्यक्तिगत आजादी नहीं छीनी जा सकती। न्यायालय ने निचली अदालत के तीन जून के आदेश को निरस्त करते हुए उसे दोबारा नियमानुसार उचित आदेश पारित करने के निर्देश दिए हैं।