एकीकृत आजीविका सहयोग परियोजना की सहयोगी संस्था भुवनेश्वरी महिला आश्रम की ओर से धान की उन्नत खेती विषय पर गोष्ठी आयोजित की गई। इसमें कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को बीजों की बुवाई की नवीनतम तकनीक बताई। विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा के शस्य वैज्ञानिक डा. बीएम पांडे ने कहा कि धान की वैज्ञानिक खेती करने से पैदावार दोगुनी होती है।
तैलीहाट गांव में हुई गोष्ठी में विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा के शस्य वैज्ञानिक डा. बीएम पांडे ने बताया कि धान की उन्नत प्रजाति वीएल धान 62 की बुवाई करनी चाहिए। इसका उत्पादन परंपरागत धान की तुलना से अधिक होता है। चावल भी अच्छा निकलता है। तकनीकी अधिकारी शिव सिंह खेतवाल ने धान मड़ाई थ्रेेशर के बारे में बताया। कहाकि यह वजन में काफी कम होता है। इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है।
वहां अखिल भारतीय धान समन्वित योजना के तहत धान प्रजाति वीएल 62 की क्षेत्र में उत्पादन का आकलन किया जाएगा। इसके तहत दो हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई की नर्सरी के लिए 20 किसानों में 80 किलो धान का वितरण किया गया। नर्सरी लगाने की विधि के बारे में बताया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि वीएल 62 प्रजाति 135 दिन में तैयार होती है। इसका उत्पादन 50-55 कुंतल प्रति हेक्टेयर होता है।
उन्होंने गेहूं के खेतों का भी किसानों के साथ भ्रमण कर उन्नत तकनीक बताई। वहां प्रभागीय प्रबंधन इकाई के परियोजना प्रबंधक कमलेश गुरुरानी, सहायक प्रबंधक जेंडर एवं संस्थाएं धर्मेंद्र कुमार पांडे, सहयोगी संस्था श्री महिला भुवनेश्वरी आश्रम के तकनीकी समन्वयक चंद्रमणि उनियाल, बीएस गुसांई, ग्राम प्रधान, स्वयं सहायता समूहों के सदस्य मौजूद थे।