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आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम है सहस्त्रधारा और भद्रतुंगा

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बागेश्वर। देवभूमि के नाम से विख्यात उत्तराखंड को कुदरत ने कई नेमत बख्शी हैं। प्राकृतिक सौंदर्य की अद्भुत आभा पर्यटकों को विस्मृत करने के साथ यहां बार-बार आने को विवश भी कर सकती है। कपकोट तहसील के झूनी गांव स्थित सरयू नदी का उद्गम स्थल सरमूल और सहस्त्रधारा भी ऐसे ही मनोरम और पावन स्थल हैं। पर समस्या यह है कि सड़क, बिजली और इंटरनेट जैसी सुविधाएं नहीं होने से ये इलाका भारत के पर्यटन मानचित्र पर नहीं है। हालांकि सरकार ने क्षेत्र के धार्मिक स्थलों को पर्यटन सर्किट से जोड़ने की कवायद शुरू करने से स्थानीय निवासियों को उम्मीद जगी है।
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सरयू नदी को पतित पावनी माना गया है। झूनी गांव के पास की पहाड़ी पर सरयू नदी का उद्गम स्थल सरमूल, जहां से नदी कई धाराओं में विभाजित होकर निकलती है। इस धारा को सहस्त्रधारा के रूप में जाना जाता है। तहसील के कई गांवों के लिए यह स्थल पुरातन काल से धार्मिक आस्था का केंद्र रहा है। सहस्त्रधारा में मां सरयू, बाबा गोरखनाथ और भगवान शिव का मंदिर बना हुआ है। सहस्त्रधारा से निकलकर नदी कपकोट में खीरगंगा और बागेश्वर में गोमती नदी के साथ संगम बनाती है। आगे कई नदियों से मिलकर नदी अयोध्या तक जाती है। बीच में नदी के नाम बदलते रहते हैं, लेकिन अयोध्या जाकर यह फिर अपने मूल नाम को ग्रहण कर लेती है। सरयू की महिमा का बखान कई धर्मग्रंथों में भी किया गया है। (संवाद)
महापुरुषों की तपस्थली रहा है सरमूल
बागेश्वर। सरयू नदी का मूल महापुरुषों की तपोस्थली भी रहा है। इसे मुनि वशिष्ठ की तपोस्थली के रूप में जाना जाता है। 20वीं सदी से 70 के दशक में नानतिन बाबा ने चार माह की तपस्या की। महात्मा आलोकानंद, रामस्वरूपानंद ने छह-छह माह की तपस्या की।
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बागेश्वर से 60 किमी की दूरी पर है सहस्त्रधारा
बागेश्वर। सहस्त्रधारा की दूरी बागेश्वर से करीब 60 किलोमीटर है। जिला मुख्यालय से सूपी तक करीब 46 किमी की दूरी वाहन से तय की जाती है, इसके आगे भद्रतुंगा और सहस्त्रधारा की यात्रा पैदल तय करनी पड़ती है। सूपी से झूनी के रास्ते करीब 14 किमी की पैदल दूरी तय करने के बाद सहस्त्रधारा तक पहुंचा जा सकता है। एक पैदल रास्ता नदी किनारे भी है, जहां से आने-जाने में 12 किमी दूरी तय करनी पड़ती है।
समिति की मुहिम पर कोश्यारी ने की थी पदयात्रा
बागेश्वर। सहस्त्रधारा को देश और विदेश में पहचान दिलाने की मुहिम 2017 से शुरू हुई। 16 जून 2017 को जसरौली गांव में महंत देवानंद दास और वर्तमान में भद्रतुंगा, सरमूल, सहस्त्रधारा विकास समिति के सलाहकार दयाल कुमल्टा ने पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से भेंट कर सरमूल के विकास पर चर्चा की। सहस्त्रधारा से पूर्व सीएम कोश्यारी का विशेष लगाव रहा है। वर्ष 1963 में उनका यज्ञोपवीत संस्कार सहस्त्रधारा में ही हुआ था। एक नवंबर 2017 को उन्होंने भी सहस्त्रधारा की एक दिवसीय पदयात्रा की, जिसमें 100 से अधिक लोग मौजूद थे।
सात दिवसीय पदयात्रा से खींचा ध्यान
बागेश्वर। सहस्त्रधारा को पहचान दिलाने के लिए 10 से 17 जुलाई 2017 के बीच सात दिवसीय पदयात्रा की गई। वर्तमान में विकास समिति के अध्यक्ष भगवत कोरंगा के नेतृत्व में निकली यात्रा के सूत्रधार 16 लोग थे। इनमें झूनी की तत्कालीन ग्राम प्रधान मानमती देवी भी शामिल थीं। पदयात्रा में 70 साल की बुजुर्ग मानुली देवी और 13 साल के बालक पूरन ने भी भागीदारी की। सहस्त्रधारा से शुरू हुई पदयात्रा का समापन बागेश्वर में बाबा बागनाथ का सरमूल से लाए पावन जल के अभिषेक के साथ हुआ।
साधु-संतों का लगा जमावड़ा
बागेश्वर। समिति ने सरमूल, सहस्त्रधारा को पहचान दिलाने के लिए देश के कोने-कोने में जाकर साधु-संतों से भेंट की। सरमूल पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म का निर्माण भी किया। समिति के सदस्यों ने अयोध्या में संतों से मुलाकात की तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छोटे भाई पंकज मोदी से भी सहस्त्रधारा को लेकर चर्चा की। 11 जून 2018 को महामंडेलश्वर संत अभिरामदास त्यागी के नेतृत्व में भद्रतुंगा में रामार्चन किया गया, जिसमें छह राज्यों के साधु-संतों ने शिरकत की।
भद्रतुंगा, सहस्त्रधारा में पर्यटन विभाग की ओर से व्यू प्वाइंट, बैंच निर्माण और पैदल खडंजा मार्ग बनाने का काम चल रहा है। पर्यटन सर्किट से जोड़ने की कवायद शासन स्तर पर चल रही है। - कीर्ति चंद्र आर्या जिला पर्यटन अधिकारी बागेश्वर
तप्तकुंड, भद्रतुंगा, सहस्त्रधारा और सरमूल को पर्यटन सर्किट से जोड़कर विकसित करने की कार्ययोजना को लेकर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज से वार्ता हुई है। जल्द ही इस क्षेत्र में कार्य होने की उम्मीद है। - शेर सिंह गढ़िया, बीसूका उपाध्यक्ष उत्तराखंड
भद्रतुंगा, तप्तकुंड, कपकोट, हरसीला, बालीघाट और बागेश्वर में भगवान शिव के मंदिर हैं। समिति सभी मंदिरों को पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाना चाहिए। - भगवत सिंह कोरंगा अध्यक्ष सहस्त्रधारा विकास समिति
सहस्त्रधारा का आधार शिविर है भद्रतुंगा
बागेश्वर। सूपी गांव से दो किमी की दूरी पर सरयू नदी किनारे बसा भद्रतुंगा रमणीय स्थल है, यहां चारों ओर हरे-भरे पौधे हैं। भद्रतुंगा में शिवालय के अलावा सरयू मैया और हनुमान मंदिर है। यहां पर बैशाखी पूर्णिमा के दिन स्थानीय मेला लगता है। अन्य पर्वों पर भी पूजा-अर्चना के लिए ग्रामीण उमड़ते हैं। इस स्थान पर तर्पण और पिंडदान का भी महत्व है। यहां संत स्वामी रामानंद दास का आश्रम है। भद्रतुंगा से सहस्त्रधारा के लिए दो रास्ते जाते हैं। एक सरयू नदी के किनारे से और दूसरा झूनी गांव से होकर जाता है। पर्यटन सर्किट से जुड़ने पर सबसे अधिक विकास कार्य भद्रतुंगा में कराए जाएंगे। भद्रतुंगा, सरमूल, सहस्त्रधारा विकास समिति इस स्थान पर धर्मशाला, टैंट लगाने के लिए मैदान, सार्वजनिक शौचालय बनवाने की मांग कर रही है।
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