बागेश्वर। धरमघर स्थित देश के एकमात्र कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र में आठ साल बाद दुर्लभ कस्तूरी निकाली गई। कस्तूरी को शोध और अनुसंधान के लिए दिल्ली भेज दिया गया है। केंद्र में वर्ष 2010 से कस्तूरी निकालने की प्रक्रिया बंद थी। इससे केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को लाखों डॉलर की चपत लग चुकी है।
वर्ष 1974 में मंत्रालय ने महरूड़ी में कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र की स्थापना की थी। यह देश भर में अपनी तरह का एकलौता कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र है। यहां उच्च हिमालयी क्षेत्र (10 हजार फुट ऊंचाई) के दुर्लभ वन्य जीव कस्तूरा मृग को लाकर प्रजनन और उत्पादन के लिए अनुसंधान किया जाता है। कस्तूरी का आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं में इस्तेमाल किया जाता है। हृदय रोग, पुंसत्व वृद्धि आदि इसके सामान्य प्रयोग हैं। अनुसंधान केंद्र में उत्पादित कस्तूरी को शोध संस्थानों को मुहैया कराया जाता है।
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पिछले आठ सालों से अनुसंधान केंद्र के मृगों से कस्तूरी नहीं निकाली जा रही थी। इससे पहले आखिरी बार वर्ष 2009 में कस्तूरी का दोहन हुआ था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कस्तूरी की कीमत प्रति सौ ग्राम 50 हजार डॉलर है। नर मृग से हर साल 17 से 22 ग्राम तक कस्तूरी निकाली जा सकती है।
कड़ी निगरानी में निकाली गई कस्तूरी
बागेश्वर। अनुसंधान केंद्र के मृगों से बुधवार को आठ साल बाद कड़ी निगरानी के बीच दुर्लभ कस्तूरी निकाली गई। कस्तूरी निकालने की प्रक्रिया केंद्रीय आयुर्वेदिक सिद्ध अनुसंधान परिषद के महानिदेशक प्रो. केएस धीमन और क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान केंद्र के सहायक निदेशक डॉ संजीव कुमार, केंद्र प्रभारी डॉॅ. ललित मोहन सिंह नयाल की मौजूदगी में पूरी हुई। केंद्र प्रभारी ने बताया कि उत्पादित कस्तूरी को दिल्ली स्थित मुख्यालय भेजा जा रहा है। ब्यूरो