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गोरों की यातनाएं सहीं लेकिन सिर नहीं झुकाया

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स्वतंत्रता सेनानी राम सिंह चौहान। - फोटो : BAGESHWAR
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बागेश्वर। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में शामिल होकर देश की आजादी की जंग लड़ने वाले स्वाधीनता सेनानी राम सिंह चौहान में 98 वर्ष की उम्र में भी जोशोखरोस बरकरार है। चौहान गढ़वाल राइफल में ट्रेनिंग लेने के दौरान ही नेताजी से प्रभावित होकर आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए थे। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की तमाम यातनाएं सही लेकिन अंग्रेजों के सामने झुके नहीं। सेनानी चौहान वर्तमान व्यवस्था से खफा हैं।
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जिले के 124 सेनानियों में से एकमात्र जीवित स्वाधीनता सेनानी वज्यूला पासतोली (गरुड़) निवासी राम सिंह चौहान का जन्म 21 जून 1922 को हुआ था। उनके पिता हवलदार तारा सिंह चौहान गढ़वाल राइफल में तैनात थे। 19 वर्ष की आयु में 9 जनवरी 1941 को वह गढ़वाल राइफल में भर्ती हुए। उस दौर में हर तरफ आजादी की उमंग लोगों के दिलों में हिलोरे ले रही थी। राम सिंह अभी ट्रेनिंग ही प्राप्त कर रहे थे कि कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान ने उन्हें भी झकझोर दिया और वह 15 फरवरी 1942 को अपने साथियों के साथ मय हथियार के आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए।
सुभाष चंद्र बोस के साथ अंग्रेजों से जंग शुरू की। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर वर्मा, मुलतान, कोलकत्ता आदि जेलों में रखा। यातानाएं दीं, लेकिन वह आजाद हिंद फौज से जुड़े रहे। उन्होंने सजा से बचने के लिए अंग्रेजों से कोई माफी नहीं मांगी। बताते हैं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर के कैथी सिनेमा हॉल में आजाद हिंद सरकार की स्थापना की घोषणा की थी। वहां पर नेताजी स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री, युद्ध और विदेशी मामलों के मंत्री और सेना के सर्वोच्च सेनापति चुने गए थे।
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राम नित्य करते हैं रामायण पाठ
शतायु के निकट पहुंचे सेनानी चौहान मे आज भी गजब का जज्बा है। रोज सुबह घूमने के बाद वह नित्य रामायण और गीता का पाठ करते हैं। हालांकि अब उन्हें सुनने में दिक्कत होने लगी है। उनके योगदान को देखते हुए 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तामपत्र देकर सम्मानित किया था।
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