कांडा पड़ाव स्थित कालिका माता के मंदिर पर क्षेत्र के लोगों की गहरी आस्था है। नवरात्र हो या अन्य पर्व यहां श्रद्धालुओं का हमेशा तांता लगा रहता है। मंदिर में कथा, भागवत, शतचंडी महायज्ञ होते रहते हैं। यहां दशहरा में बड़ा मेला लगता है। पहले दशहरा पर्व के मौके पर मंदिर में पंचबलि होती थी। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेेश से बलि प्रथा पर रोक लगी है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि जो भी भक्त मंदिर में सच्चे मन से आता है। माता उसकी सभी मनोकामना पूरी कर देती हैं।
तहसील मुख्यालय स्थित कांडा पड़ाव में कालिका माता का मंदिर पहले बहुत छोटा था। वर्ष 1998 में इसे भव्य रूप मिला है। लोक मान्यता है कि पहले कांडा क्षेत्र में कालिका माता का जबरदस्त खौफ था। वह किसी का एक व्यक्ति का नाम पुकारती तो उसकी मृत्यु हो जाती थी। ग्रामीण इस खौफ से काफी भयभीत थे। अनादिकाल में आदिगुरु शंकराचार्य कैलाश मान सरोवर यात्रा से लौट रहे थे। लोगों ने उनसे मुलाकात कर अपनी सारी पीड़ा बताई। आदिगुरु शंकराचार्य बगैर देरी किए पड़ाव में आए और उन्होंने ध्यान लगाकर सारा रहस्य जाना।
शंकराचार्य ने स्थानीय लुहार को अपने पास बुलाया और उससे लोहे की नौ कढ़ाईयां मंगाई। शंकराचार्य जी ने मंदिर परिसर में कीलक मंत्रों से देवी के कालरूप का कीलन किया। इससे माता शांत हो गई। यह शिला मंदिर के प्रांगण में है। शंकराचार्य जी के इस कदम से यहां तब से कोई नर बलि नहीं होती है। मंदिर में नवरात्र पर्व के अलावा वर्ष भर पूजा अनुष्ठान होते रहते हैं।
मंदिर में दशहरा पर बड़ा मेला लगता है।
इनमें इस जिले के लोग ही नहीं बल्कि दूर-दूर से बड़ी संख्या में मेलार्थी शामिल होते हैं। मंदिर में पहले भैंसा, कुष्मांडा, बकरी, छिपकली और सुअर की बलि दी जाती थी। गत चार साल पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मंदिर परिसर में किसी प्रकार बलि नहीं दी जाती हैं। मंदिर के पुजारी नाग कन्याल के कांडपाल परिवार जबकि पूजा पाठ की जिम्मेदारी नारायण गूंठ के परिवारों के ऊपर है।