वैलेंटाइन सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका का ही दिन नहीं है। यह दिन तो बच्चों का माता-पिता के प्रति, एक दोस्त का दूसरे दोस्त के लिए, प्रकृति के लिए, पर्यावरण या जानवरों के लिए आपके प्रेम के इजहार करने का है। ऐसा ही वैलेंटाइन-डे खास है राहुल और उसकी बहन पूजा का फादर विक्टर सिंह के लिए। मुफलिसी की जिंदगी में जी रहे राहुल और पूजा राना को फादर विक्टर सिंह से अपने मृत माता-पिता से ज्यादा प्यार है। इन बच्चों के वैलेंटाइन फादर विक्टर ही हैं।
गरुड़ के गागरीगोल क्षेत्र मूल निवासी राहुल और पूजा की मां और पिता का बचपन में संक्रामक बीमारी से निधन हो गया था। अल्पायु में माता-पिता के निधन के बाद उनकी परवरिश करने के लिए जाति बिरादरी के लोग आगे नहीं आए। ऐसे में आगे आए फादर विक्टर सिंह (70)। पेंटिंग कर अकेले जीवन यापन कर रहे फादर विक्टर ने दोनों बच्चों को अपनाया और माता-पिता से ज्यादा प्यार देकर उनका भविष्य बना रहे हैं।
वृद्ध फादर विक्टर सिंह पेंटिंग कर दोनों बच्चों को प्रार्थना भवन में रखकर पिछले 10 साल से पढ़ा-लिखा रहे हैं। राहुल वर्तमान में राइंका गरुड़ में 11वीं में और पूजा राजकीय बालिका इंटर कालेज पाये में 12वीं की कक्षा में अध्ययनरत है। दोनों बच्चों ने बताया कि उनके वैलेंटाइन तो फादर विक्टर सिंह ही हैं और हमेशा रहेंगे। उनकी सीख से ही हम भाई-बहन आज इस मुकाम पर हैं।
वैलेंटाइन-डे पर फादर विक्टर के साथ ही चर्च में पूजा-अर्चना करेंगे और कुछ रचनात्मक कार्य भी, क्योंकि फादर की पेंटिंग बहुत अच्छी है। फादर ने बताया कि पूजा जब इंटर पास कर लेगी तो आगे की शिक्षा दिलाने के लिए जनसहयोग की जरूरत होगी। फादर ने बातचीत में अमर उजाला का आभार जताते हुए कहा कि इस जनसरोकार से जुड़े अखबार से हमेशा ही मदद मिली है। लोगों ने अमर उजाला में ही दोनों बच्चों के बारे में पढ़कर मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए थे। उम्मीद है कि आगे भी बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए लोगों का सहयोग मिलता रहेगा।
वहीं रानीखेत जरूरी बाजार निवासी सतीश चंद्र पांडेय पिछले दो दशक में सात सौ से अधिक शवों का निशुल्क दाह संस्कार कर चुके हैं। यही नहीं जरूरतमंदों को अर्थी के लिए निशुल्क बांस भी उपलब्ध कराते हैं।
जनसेवा का ऐसा जुनून कि लोगों की सेवा के लिए अपनी कंट्रोल की दुकान भी बंद कर देते हैं। इसीलिए स्थानीय लोगों ने उन्हें 108 इमरजेंसी एंबुलेंस की तर्ज पर 109 इमरजेंसी मैन की उपाधि दी है।
क्षेत्र के 16 गांवों के लोग सतीश चंद्र पांडेय के यहां से अर्थी के लिए निशुल्क बांस ले जाते हैं। पांडेय के अनुसार अब तक वह सात सौ से अधिक लावारिस शवों का निशुल्क अंतिम संस्कार कर चुके हैं। उन्होंने जनसेवा के लिए एक समिति बनाई है, लेकिन समिति सरकारी मदद नहीं लेती।
2005 में पांडेय ने कार्य करते वक्त बुरी तरह जख्मी हुए नेपाली मजदूर जंग बहादुर का इलाज कराया। 2006 में ब्वाय फ्रेंड की ठगी का शिकार बनी उड़ीसा की एक युवती को उसके भाई के पास दिल्ली भेजा। 2006 में ही एक गरीब बालिका का ऑपरेशन, 2007 में करंट लगने से घायल हुए कुछ पक्षियों का इलाज कराकर उन्हें नव जीवन दिलाया।
2008 में हरियाणा से घूमने पहुंचे पर्यटक कृष्ण कुमार को निजी खर्चे से गंतव्य तक भेजा। इतनी उपलब्धियों के बावजूद पांडेय को किसी भी संस्था द्वारा बड़े सम्मान से नहीं नवाजा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।