आयुष मंत्रालय और वन विभाग में आपसी सामंजस्य नहीं होने से कुमाऊं के एकमात्र कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र में पिछले सात सालों से कस्तूरी निकालने का काम बंद पड़ा है। वन विभाग की ओर से लगाई गई रोक के कारण पिछले दो सालों से प्रजनन भी नहीं हो रहा है। इसके चलते हर साल एक करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हो रहा है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से वर्ष 1974 में बागेश्वर जनपद के महरूड़ी धरमघर में कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई थी।
इस केंद्र का उद्देश्य कस्तूरा मृगों से कस्तूरी निकालकर आयुर्वेदिक व यूनानी दवा बनाने के लिए देश के शोध संस्थानों को उपलब्ध कराना था। इस केंद्र से निकाली गई कस्तूरी को भेषज विज्ञान के पटियाला, कोलकाता, ग्वालियर और केरल स्थित अनुसंधान केंद्रों को भेजा जाता है। कस्तूरा से पुंसत्व बढ़ाने और कार्डियो से संबंधित दवाएं बनाई जाती हैं। कस्तूरी नर कस्तूरा मृगों की नाभि में जुलाई से अगस्त में तैयार होती है। इसे सितंबर-अक्तूबर माह में निकाला जाता है।
कस्तूरी निकालने की प्रक्रिया वन और पशु चिकित्सा विभाग के सलाहकारों सहित चार सदस्यीय टीम की देखरेख में होती है। विशेषज्ञों के अनुसार अंतराष्ट्रीय बाजार में एक ग्राम कस्तूरा की कीमत लगभग 80 हजार रुपये है। एक नर कस्तूरा से 15 से 20 ग्राम कस्तूरी निकल सकता है। 10 नर कस्तूरा मृगों से हर साल लगभग एक करोड़ रुपये की कस्तूरी निकाली जा सकती है। इसके बावजूद आयुष मंत्रालय ने साल 2004 में इस केंद्र को बंद कर वन विभाग को सौंपने के निर्देश दे दिए।
यह केंद्र वन विभाग को हस्तांतरित तो नहीं हुआ, लेकिन उत्तराखंड के वन्य जंतु प्रतिपालक की ओर से वर्ष 2010 में कस्तूरी निकालने पर रोक लगा दी गई। इसके बाद पिछले दो सालों से प्रजनन का काम भी बंद हो गया है। प्रजनन बंद होने और प्राकृतिक व बीमारी से हो रही मौतों के कारण कस्तूरा मृगों की संख्या लगातार कम हो रही है। अब केंद्र में 16 कस्तूरा मृग बचे हैं।
आयुष मंत्रालय और वन विभाग में तालमेल की कमी और इस केंद्र को बंद करने के विरोध के कारण कस्तूरा मृगों को नैनीताल जू में भेजने की प्रक्रिया भी ठंडे बस्ते में है। कस्तूरी निकालने और प्रजनन पर पाबंदी लगने के बाद यह केंद्र कब तक संचालित हो सकेगा इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
- वर्ष 2010 से कस्तूरी निकालने का काम बंद है। अनुसंधान केंद्र में वर्ष 2015 के बाद कस्तूरा मृगों में प्रजनन भी नहीं कराया जा रहा है। इस केंद्र को नैनीताल जू को हस्तांतरण करने की कार्रवाई उच्च स्तर पर चल रही है। उच्चाधिकारी स्तर से जो भी दिशा-निर्देश मिलेंगे उसी के अनुसार कार्य किया जाएगा।
-डॉ. एलएम नयाल, प्रभारी, कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र, धरमघर, बागेश्वर।