महरूड़ी का कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र।
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धरमघर में स्थित कुमाऊं के एकमात्र कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र में कस्तूरा मृगों की संख्या मात्र 16 रह गई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले 43 वर्षों से संचालित हो रहे इस अनुसंधान केंद्र में कस्तूरा मृगों की तादात आज तक 24 का आंकड़ा पार नहीं कर पाई। विशेषज्ञों की मानें तो इंटर ब्रीडिंग के कारण अनुसंधान केंद्र में मृगों की तादात नहीं बढ़ पाई।
वर्ष 1974 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से बागेश्वर जिले के महरूड़ी (धरमघर) में कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई थी। इस केंद्र का उद्देश्य दुर्लभ कस्तूरा मृगों का प्रजनन कराकर उनको संरक्षित करना और कस्तूरी निकालकर अनुसंधान के लिए देश के शोध संस्थानों को उपलब्ध कराना था। शुरुआत में उच्च हिमालयी क्षेत्र से नौ कस्तूरा मृग यहां लाए गए थे, लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि इस केंद्र में पिछले चार दशकों में कस्तूरा मृगों की संख्या में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो सकी। वर्ष 2000 से 2003 के बीच ही इस केंद्र में कस्तूरा मृगों की संख्या सर्वाधिक 24 तक पहुंची, जबकि अन्य वर्षों में मृगों की संख्या 16-17 के बीच रही। इसके पीछे विशेषज्ञ इंटर ब्रीडिंग को मुख्य कारण मानते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार चार दशक पूर्व जो कस्तूरा मृग पकड़ कर लाए गए थे, तब से उन्हीं में इंटर क्रॉस किया जा रहा है। नर-मादा के एक ही परिवार का होने के कारण पैदा होने वाले कस्तूरा मृगों में तमाम तरह की बीमारियां हो जाती हैं। ऐसे में ज्यादातर शावक जीवित नहीं रह पाते हैं। प्रजनन के लिए जंगल से कस्तूरा मृगों को पकड़कर लाने की अनुमति नहीं है। वन विभाग ने इस अनुसंधान केंद्र में पिछले दो सालों से कस्तूरा मृगों के प्रजनन पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। प्रजनन बंद होने और प्राकृतिक एवं तमाम तरह की बीमारियों से हो रही मौत के कारण कस्तूरा मृगों की संख्या वर्तमान में मात्र 16 रह गई है।
कोट
वर्ष 2000 से 2003 तक अनुसंधान केंद्र में कस्तूरा मृगों की संख्या 24 तक पहुंच गई थी। इस समय केंद्र में 16 कस्तूरा मृग बचे हैं। इनकी पशु चिकित्सकों से नियमित जांच कराई जाती है। वन विभाग की ओर से रोक के कारण पिछले दो सालों से प्रजनन का काम बंद है।
डॉ. ललित मोहन सिंह नयाल, प्रभारी, कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र, धरमघर (बागेश्वर)।