बागेश्वर। महाशिवरात्रि पर्व ज्ञान की श्रेष्ठता और कल्याणकारी विचारधारा की स्थापना का पर्व है। फाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को भगवान शिव लिंग रूप में प्रकट हुए थे। पहली बार भगवान ब्रह्मा और विष्णु ने शिवरात्रि को चार प्रहरों में शिवलिंग का पूजन किया था। तभी से महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है।
स्वयं को श्रेष्ठ घोषित करने के लिए जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा संग्राम करने लगे तब उनके अविवेक को दूर करने के लिए शिव लिंग रूप में प्रकट हुए। निर्गुण या लिंग रूप के आदि और अंत का कोई छोर नहीं था। शिव ने ब्रह्मा को लिंग के आदि और विष्णु को अंत खोजने के लिए कहा, लेकिन दोनों ही लिंग का आदि-अंत नहीं खोज सके। ब्रह्मा ने केतकी के पुष्प का सहारा लेकर स्वयं को श्रेष्ठ घोषित करने का प्रयास किया, रुद्रगणों ने ब्रह्मा के झूठ को पकड़ लिया। झूठ बोलने के कारण ब्रह्मा को नित्यपूजा से वंचित कर दिया गया। भगवान विष्णु सत्य बोलने के चलते सत्यनारायण रूप में प्रतिष्ठित हुए। जिसके बाद ब्रह्मा और विष्णु ने लिंग रूप शिव का चार प्रहरों में षोडशोपचार पूजन किया। शिवपुराण के विंदयेश्वर संहिता के अनुसार भगवान शिव पूजा से प्रसन्न हुए और उन्होंने इस रात्रि को शिवरात्रि के रूप में प्रतिष्ठित और पूजित होने का वरदान दिया। जिसके बाद से फाल्गुन के कृष्णपक्ष की चतुदर्शी को महाशिवरात्रि पर्व के रूप में मनाया जाता है।
रात्रिव्यापिनी शिवरात्रि में पूजा का विशेष महत्व
बागेश्वर। शास्त्रों में निशीत या रात्रिव्यापिनी शिवरात्रि में शिवपूजन का विशेष महत्व बताया गया है। जिस प्रकार महालक्ष्मी के प्राकट्य दिवस को कालरात्रि, माता दुर्गा के प्राकट्य दिवस को मोहरात्रि, कृष्ण रासलीला को ब्रह्मरात्रि के रूप में मनाया जाता है। उसी प्रकार भगवान शिव के प्राकट्य दिवस की रात्रि को महाशिवरात्रि के रूप में मनाने का विधान है। शिवरात्रि को भस्म, त्रिपुंड, रुद्राक्ष धारण कर जलाभिषेक करने और बिल्वपत्र से पूजा करने पर भगवान शिव सभी मनोकामनाओं को पूरा करते हैं।
महाशिवरात्रि पर्व के लिए मंदिर प्रबंधन ने बागनाथ मंदिर की फूलों से सजावट की है। मंदिर में आने वाले भक्तों की पूजा के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। नीलेश्वर पर्वत पर स्थित नीलेश्वर महादेव मंदिर में भी शिवरात्रि को भक्त पूजा को उमड़ते हैं। गरुड़ के बैजनाथ मंदिर, कपकोट के शिव मंदिर सहित अन्य तहसीलों में भी शिव मंदिरों में भी सजावट और तैयारियां पूरी हो चुकी हैं।
कोट
शिव शब्द कल्याण और रात्रि अज्ञान का वाचक है। कल्याणकारी विचारों से ही अविवेक का नाश और सृष्टि का विकास हो सकता है। यही महाशिवरात्रि पर्व का गंभीर अर्थ है। - डॉ. गोपाल कृष्ण जोशी आचार्य/प्रवक्ता।