बागेश्वर। अतीत में उत्तरायणी के मेले में झोड़ा, चांचरी भगनौल, बैर लोक विधा की धूम रहती थी। आधुनिकता की होड़ में यह प्राचीन विधा उत्तरायणी के मेले से भी लगभग गायब हो गई है। अब इसका सांकेतिक स्वरूप ही मेले में दिखाई देता है।
उत्तरायणी मेले का इतिहास एक सदी से भी पुराना है। बुजुर्ग बताते हैं कि प्राचीन समय में नगर के चौक बाजार के पीपल के वृक्ष के साथ ही ऐतिहासिक झूलापुल और नुमाइशखेत मैदान के पास सरयू तट पर झोड़ा, चांचरी भगनौल, बैर लोक विधा की धूम मचती थी। लोग रातभर लोक विधाओं का गायन करते थे। रातभर महिलाएं चांचरी गायन करते थे।
लोक विधाओं के गायन के लिए धूनी जमती थी। गांवों से आने वाले लोग साथ में लकड़ियां लेकर आते थे। रातभर आग जलाई जाती थी। सरकार की ओर से भी नदी के किनारे बड़े स्तर पर अलाव जलाए जाते थे। बुजुर्ग अर्जुन सिंह बनकोटी बताते हैं कि प्राचीन समय में लोक गायक मोहन सिंह रीठागाड़ी, प्रताप सिंह, गोपाल राम भगनौल, बैर की प्रस्तुति देते थे। एक महीने से भी अधिक समय तक मेला चलता था। संवाद
आण, काथ में व्यस्त रहते थे लोग
बागेश्वर। बुजुर्ग बताते हैं कि प्राचीन समय में उत्तरायणी के मेले में आण (पहेली), काथ (कहानी) की धूम रहती थी। लोग आण पूछते थे। उत्तर बताने पर सराहना मिलती थी। बुजुर्ग अतीत की काथ सुनाते थे। अब यह सब पहाड़ की संस्कृति से विलुप्त हो गया है। संवाद
हुड़के की थाप पर रातभर घूमते थे युवा
बागेश्वर। बागेश्वर जिले की सीमा से सटे बनकोट (गंगोलीहाट) के मूल निवासी 85 वर्षीय अर्जुन सिंह बनकोटी बताते हैं कि प्राचीन समय में उत्तरायणी के मेले में रातभर लोक विधा का गायन होता था। नव युवक रातभर हुड़के की थाप में नगर में घूमकर गायन करते थे। बनकोट के साथ ही गंगोलीहाट, बेरीनाग से लोग पैदल चलकर मेले में पहुंचते थे। संवाद
20-25 साल पहले तक मचती थी धूम
बागेश्वर। लोक विधा के संरक्षण में जुटे मंडलसेरा निवासी किशन सिंह मलड़ा (56) बताते हैं कि आज से 20-25 साल पहले तक उत्तरायणी मेले में लोक विधाओं का गायन प्रमुख आकर्षण होता था। आधुनिकता की होड़, पुरातन संस्कृति को बचाने के ठोस प्रयास न होने से यह विधा विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है। लोकविधा का संरक्षण हम सभी की जिम्मेदारी है। संवाद