आपदा पीड़ित कुंवारी गांव के बाशिंदों पर खतरा मंडरा रहा है। इस गांव में 106 परिवार आज भी खौफ से साये में जी रहे हैं। भू-वैज्ञानिक गांव को संवेदनशील करार दे चुके हैं। लेकिन पुनर्वास न होने के चलते लोग आपदा से अभिशप्त मकानों में रहने को मजबूर हैं। कई बार मांग उठाने के बाद भी पुनर्वास न होने से नाराज ग्रामीणों ने कलक्ट्रेट में प्रदर्शन किया। उन्होंने एक सितंबर से गांव में ही आमरण अनशन पर बैठने की चेतावनी दी है।
शनिवार को कुंवारी गांव के आपदा पीड़ित कलक्ट्रेट पहुंचे। उन्होंने यहां शासन-प्रशासन पर आपदा पीड़ितों की सुध न लेने का आरोप लगाया। कहा कि वर्ष 2013 की आपदा के बाद आज तक गांव के विस्थापन और पुनर्वास की दिशा में गंभीरता से काम नहीं हुआ। अभी तक महज 19 का ही पुनर्वास हो पाया है। जबकि गांव के 106 परिवार आज भी खतरे के बीच रहने को मजबूर हैं। इस साल भूस्खलन से और परिवारों पर भी खतरा मंडरा रहा है। आपदा से ग्रामीणों की खेती और रास्ते बर्बाद हो चुके हैं। लोग गांव में ही बंधक और अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर हैं। इस बार भी मानसून में खतरा सिर पर मंडरा रहा है।
लेकिन अभी तक प्रभावितों का पुनर्वास को दूर खाका तक तैयार नहीं हो पाया है। ग्रामीणों ने विस्थापन और पुनर्वास के लिए अगस्त तक मोहलत दी है। ऐसा न होने पर ग्रामीणों ने पहली सितंबर से गांव में ही आमरण अनशन पर बैठने की चेतावनी दी है। इस दौरान खीम सिंह, मदन सिंह, मोहन राम, रघुवर राम, लछम सिंह, धरम राम, देव सिंह, विनोद सिंह, नरेंद्र सिंह, केशर सिंह, कवींद्र कुमार, चंदन कुमार, बलवंत राम, प्रेम सिंह, रमेश राम, गोपाल सिंह आदि थे।
जोखिम के बीच गर्भवती ने डोली में सफर किया
बागेश्वर। कुंवारी गांव में शंभू नदी के उफान पर होने से ग्रामीणों की जान जोखिम में है। नदी के उफान के साथ ही रास्ता बंद हो गया है। लोग खतरे के बीच आवाजाही को मजबूर हैं। बीमारी, प्रसव आदि आपात परिस्थितियों में जान का जोखिम बना है। ग्रामीणों ने बताया कि पिछले दिनों एक गर्भवती को पहली डिलीवरी वाले नाजुक केस में डोली में लादकर ले जाना पड़ा। खराब मौसम, प्रसव पीड़ा के बीच गर्भवती को सात किमी पैदल देवाल थराली तक लाए। थराली में महिला की हालत बिगड़ गई। महिला ने थराली में ही बच्चे को जन्म दिया।