साहित्यकार केशवानंद जोशी ने बहू-बेटी नामक आंचलिक हिंदी उपन्यास लिखा है। उत्तरायणी के मौके पर यह उपन्यास प्रकाशित हुआ। जिसमें पहाड़ के ग्रामीण परिवेश में विषम हालातों के साथ जूझती महिला के संघर्षों को अभिव्यक्ति दी है।
पहाड़ी महिला की परंपरागत समस्या के साथ ही बदलते परिवेश में उसके सामने मौजूद अवसरों को भी सामने रखा है। परिवार, समाज में उपेक्षित तिरस्कृत सरला की मजबूत इच्छा शक्ति, त्याग, समर्पण बहू बेटी के कथानक का मुख्य आधार है।
पदम के पिता उसे जेई बताकर पढ़ी-लिखी संस्कारवान लड़की सरला से विवाह करा देते हैं। विवाह के बाद असलियत सामने आने पर भी सरला कोई प्रतिक्रिया किए बगैर हालात से समझौता कर लेती है। पदम चंडीगढ़ में प्राइवेट नौकरी करता है।
सरला भी वहां जाती है। पदम की आदतें ठीक नहीं हैं। कुछ समय बाद वह सरला को छोड़कर गुम हो जाता है। वहां सरला का एक पुत्र होता है। उसे लेकर सरला एक सहेली की मदद से घर लौटती है, लेकिन सास-ससुर से लेकर परिजन, पड़ोस के लोग तक उसे ताने, उलाहने देते हैं।
एक दिन सास-ससुर उसे दुधमुंहे बच्चे समेत घर से निकाल देते हैं। मायके जाकर वह अपनी क्षमताओं के सहारे नए सिरे से खड़ा होने के लिए सामाजिक कार्यों से जुड़ जाती है। हालांकि यहां के समाज में भी उसे तिरस्कृत, उपेक्षित नजर से देखा जाता है। सरला हार नहीं मानती, वहां ग्राम प्रधान चुनी जाती हैं।
हैसियत बदलने के बाद वह सास-ससुर की पेंशन लगवाती है। अपने संपर्कों की मदद से ससुराल में निर्बल आवास बनवाती है। छोटे भाई, देवर की मदद करती है। दो परिवारों की संकटमोचक बनकर अपने चरित्र, क्षमता को साबित करती है। पुत्र चार साल का हो जाता है।
उसका पति महानगरों में कई प्रकार के लोगों की संगत में रहकर ठोकरें खाने के बाद संभल जाता है। वह गांव के संपर्क में है, सरला के संघर्षों से प्रेरणा लेकर घर लौटता है। सरला भी ससुराल आ जाती है। जोशी की इस पुस्तक में पहाड़ के बदलते सामाजिक परिवेश का सटीक चित्रण किया गया है।
जिसमें सामाजिक वर्जनाओं के साथ ही आधुनिक प्रगति के कारण महिला के सम्मुख उपलब्ध अवसरों को भी दर्शाया गया है। 114 पृष्ठों के इस उपन्यास में सरल हिंदी का प्रयोग किया गया है।