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जी रया, जाग रया, यौ दिन यौ मास भेटनै रया...

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बागेश्वर। जिले में आस्था और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक पर्व हरेला विधिविधान के साथ मनाया गया। घरों में हरेला काटकर भगवान को अर्पित किया गया। बुजुर्गों ने पारिवारिक जनों के मस्तक पर हरेला रखकर उन्हें सौभाग्य का आशीर्वाद दिया। लोगों ने घरों में विभिन्न प्रजाति के पौधे रोपे और स्वादिष्ट पकवानों का भी लुत्फ उठाया।
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हरेला पर्व श्रावण मास के आगाज पर मनाया जाता है। घरों में इस दिन सुबह विधिविधान से हरेला काटकर भगवान को अर्पित किया जाता है। घरों की देहली पर हरेला रखने के बाद परिवार के सभी लोगों को घर की बुजुर्ग दादी या माता हरेला लगाती है। हरेला लगाते समय परिवार वालों के खुशहाल और सुखी जीवन की कामना करते हुए पारंपरिक आशीष बचन कहे जाते हैं। हरेले के दिन लोग घरों में फलदार और फूलों के पौधे भी लगाते हैं। वहीं विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर आस पड़ोस में बांटने का भी रिवाज है। किसान हरेला पर्व पर अच्छी उपज की पैदावार के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं। पंडित गणेश चंद्र तिवारी ने बताया कि हरेला हमारी परंपरा और आस्था से जुड़ा त्योहार है। जो अपनी जड़ों को पहचानने और पर्यावरण के प्रति मनुष्य के कर्तव्यों की याद दिलाता है। यह पर्व लोगों को प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर खुशहाल पर्यावरण के निर्माण को प्रेरित करता है।
श्रावण मास के पहले दिन बागनाथ मंदिर में उमड़े श्रद्धालु
बागेश्वर। शुक्रवार हरेला पर्व से श्रावण के पावन महीने की भी शुरुआत हो गई है। कोरोना को चलते पिछले वर्ष श्रावण में बाबा बागनाथ का जलाभिषेक नहीं कर पाए थे। इस वर्ष पहले ही दिन अच्छी तादात में भक्तों ने भगवान शिव का अभिषेक कर पूजा अर्चना की। मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष नंदन सिंह रावल ने कहा कि मंदिर में आने वाले भक्तों से कोविड नियमों का पालन करने की अपील की जा रही है।
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