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वर्तमान परिस्थितियों में महत्वपूर्ण हो सकती है गुरिल्लों की भूमिका

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बागेश्वर। जब चीन एक बार फिर भारत की ओर आंख उठा रहा है। एसएसबी के स्वयंसेवक (गुरिल्लों) की भूमिका अहम साबित हो सकती है। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद वर्ष 1963 में तत्कालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए भारत सरकार ने केंद्रीय कैबिनेट के अधीन एसएसबी का गठन किया था। एसएसबी को हिमाचल, अरुणाचल, उत्तराखंड, कश्मीर के साथ ही देश के पूर्वोत्तर राज्यों में एसएसबी की तैनाती की गई।
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एसएसबी का कार्य सीमांत के लोगों के साथ बेहतर तालमेल के साथ ही सीमा के लोगों को हथियारों का प्रशिक्षण देना था। गुरिल्ले एसएसबी के हमराही थे। एसएसबी में केवल गुरिल्लों की ही भर्ती होती थी। वर्ष 2001 में केंद्र सरकार ने एसएसबी को सशस्त्र बल में शामिल कर सशस्त्र सीमा बल नाम दे दिया और गुरिल्लों की भूमिका समाप्त कर दी। एसएसबी सीमांत के गांवों में युवाओं को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देती थी। गांव के इस बेसिक कोर्स से चुने गए युवक, युवतियों को 45 दिन की कठिन गुरिल्ला ट्रेनिंग दी जाती थी। हिमाचल के सराहन और उत्तराखंड के ग्वालदम में गुरिल्ला ट्रेनिंग दी जाती थी। युवतियों को उत्तराखंड के पौड़ी में प्रशिक्षण दिया जाता था। गुरिल्लों को कई बार प्रशिक्षण दिया जाता था। प्रशिक्षण अवधि का एक निश्चित मानदेय दिया जाता था।
गुरिल्लों के लिए वर्ष 2001 गंभीर संकट लेकर आया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एसएसबी को सशस्त्र बल का दर्जा दे दिया। इसी के साथ गुरिल्लों का एसएसबी से नाता टूट गया। इसके बाद एसएसबी में गुरिल्लों की कोई भूमिका नहीं रही। एसएसबी में सामान्य युवा भर्ती होने लगे। युद्धकला और छद्मयुद्ध में पारंगत इन गुरिल्लों की सक्रिय भूमिका अब चीन सीमा पर कारगर हो सकती है।
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पूर्वोत्तर राज्यों के गुरिल्ले एसएसबी में हो गए सेवायोजित
बागेश्वर। केंद्र सरकार ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के आदेश पर पूर्वोत्तर राज्यों के गुरिल्लों को वर्ष 2001 में ही एसएसबी में समायोजित कर दिया था। अधिक उम्र के गुरिल्लों के लिए पेंशन लागू कर दी थी लेकिन अन्य राज्यों के गुरिल्लों को कोई राहत नहीं दी गई। इसके पीछे सरकार का तर्क था कि पूर्वोत्तर के गुरिल्ले आतंकग्रस्त इलाकों में एसएसबी के साथ ड्यूटी दे रहे थे। वर्ष 2004 में पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट में गुरिल्लों ने संगठन बनाकर सेवायोजित करने और पेंशन देने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। यह आंदोलन संपूर्ण देश में फैल गया। अल्मोड़ा में कई सालों से अनवरत आंदोलन जारी है। गुरिल्ला संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष ब्रह्मानंद डालाकोटी का कहना है कि गृह मंत्रालय ने वर्ष 2015 में गुरिल्लों का सत्यापन कराया लेकिन गुरिल्लों को राहत नहीं दी है। गुरिल्ला मनीष बिष्ट, मुकुल चौधरी, हरीश सिंह, राजेंद्र चौधरी, पूरन सिंह गुरौ कहते हैं कि गुरिल्लों की अहमियत सरकार को समझनी चाहिए। गुरिल्ले चीन को उसी की तर्ज पर जवाब देने में सक्षम हैं।
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