प्रदेश के भाषा, वित्त और संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत ने कहा कि प्रदेश सरकार कुमाऊंनी, गढ़वाली और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए कई काम कर रही है। उन्होंने बताया कि राज्य में उत्तराखंड भाषा संस्थान का गठन कर लिया गया है। जिसमें हिंदी, पंजाबी, उर्दू के अलावा लोक भाषा कुमाऊंनी और गढ़वाली को भी शामिल किया गया है।
दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र तथा बीपी कोईराला इंडो नेपाल फाउंडेशन के संयुक्त पहल पर आयोजित तीन दिवसीय सेमिनार के समापन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं को संरक्षित करने की जरूरत है। इतिहासकार प्रो. एमपी जोशी ने कहा कि मध्य हिमालय में पायी गई खडूत्सी और ब्राह्मी लिपी प्राचीन लिपियां हैं। उन्होंने कहा कि मध्य हिमालय क्षेत्र में लिखने की कला अति प्राचीन है और यहां द्विभाषीय सिक्के पाए गए हैं। कुमारी ममता ने कहा कि हिमालयी भाषाएं विशिष्ट हैं।
डॉ. विष्णु कुमार सिंह ने कहा कि दारमा घाटी की बोली पर हिंदी और अंग्रेजी के साथ बाहरी सभ्यता का भी प्रभाव पड़ रहा है। उत्तराखंड सेवा निधि के निदेशक डॉ. ललित पांडे ने उत्तराखंड के ग्रामीण विकास की चुनौतियां और महिलाओं की स्थिति पर जानकारी सामने रखी। प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि बाहरी दुनिया का प्रभाव राजी बोली पर भी पड़ रहा है। जेएनयू की छात्रा आरुषि उनियाल ने बताया कि गढ़वाल में 16 प्रकार की गढ़वाली बोली जाती है। इस दौरान नेपाल के डॉ. रमेश खत्री, इलाहाबाद से डॉ. ललित पंत,जेनयू की छात्रा बेनिका तिंकरी और प्रो. शेखर जोशी ने भी विचार रखे। संचालन डा. चंद्र प्रकाश फुलोरिया ने किया।