पंचायती वन संघर्ष संगठन और प्रबोधन समिति की ओर से यहां पिंडारी रोड स्थित नरेंद्रा पैलेस में उत्तराखंड के ग्रामीण विकास पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें वक्ताओं ने कहा कि राज्य में वन, ग्रामीण विकास के कानून ब्रिटिशकाल के हैं। इनमें तत्काल बदलाव होना चाहिए।
गोष्ठी मेें उत्तराखंड में ग्रामीण विकास की अपेक्षित नीति पर चर्चा हुई। जिसमें अल्मोड़ा से आए ईश्वर जोशी ने कहा कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने गांव, वनों के विकास के लिए जो नीतियां अपनी सुविधा के हिसाब से बनाई थी, वह अभी भी जारी हैं।
रमेश कृषक ने कहा कि देश के सभी महत्वपूर्ण कानूनों की तरह ग्रामीण विकास की नीतियां भी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की विरासत के रूप में लगातार अपनाई जा रही हैं। यह कानून गुलाम नागरिकों के ऊपर थोपे गए थे। सत्तारूढ़ दलों की बेरुखी के कारण आज भी इन्हें ढोना पड़ रहा है।
हल्द्वानी से आए हरीश रावत ने कहा कि वर्तमान समय में जनविरोधी राज व्यवस्था को बदलने के लिए राजनीतिक चेतना की जरूरत है। केशवानंद जोशी ने विकास के लिए शिक्षा का स्तर सुधारने का सुझाव दिया। उत्तरकाशी के आनंद सिंह ने कहा कि उत्तराखंड आंदोलन के दौरान चेतना का ज्वार देखा गया था, वह अब गायब है।
राजनीतिक तबका राजशाही का प्रतीक बन गया है। ताकुला के चंद्र सिंह ने पंचायतों के अधिकार बढ़ाने की मांग की। रमेश कृषक ने बताया कि इसके बाद उत्तराखंड के अन्य जिलों में भी गोष्ठियां होंगी। सुझावों के आधार पर ड्राफ्ट बनाकर केंद्र, राज्य सरकारों, राजनीतिक दलों को भेजे जाएंगे। ताराशंकर पाठक ने संचालन किया।
वहां राजेंद्र सिंह कोरंगा, बसंत बल्लभ जोशी, हरीश सिंह, राजेंद्र कोरंगा, सुरेंद्र सिंह, जगदीश सिंह, आनंद सिंह, बहादुर सिंह, धन सिंह, रघुनाथ सिंह परिहार, सुजान सिंह, केदार कोरंगा, प्रबोधन समिति की सचिव सुमित्रा पांडे, योगेश पांडे, कमल सिंह, भूपेंद्र सिंह आदि थे।