अंग्रेजी हुकूमत के दौरान कुली उतार, बेगार और बर्दायश जैसे कानूनों ने कूर्मांचल के लोगों का जीना हराम किया था। 14 जनवरी 1921 को उत्तरायणी पर्व पर क्रांतिकारियों ने इन कानूूूनों से संबंधित रजिस्टरों को सरयू की पावन धारा में प्रवाहित कर इन कानूनों को न मानने का संकल्प लिया। इस आंदोलन को मिली सफलता से खुश होकर गांधी जी कुमाऊं भ्रमण के दौरान बागेश्वर आए। उन्होंने नुमाइशखेत मैदान में सभा की और आंदोलन की सफलता पर लोगों की पीठ थपथपाई।
वर्ष 1921 में कांग्रेस का नागपुर में सम्मेलन था। इसमें शामिल होने के लिए अल्मोड़ा से बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, हरगोविंद पंत समेत कई क्रांतिकारी गए। उन्होंने गांधी जी को कुली उतार, बेगार और बर्दायश जैसे काले कानूूनों से लोगों को हो रही परेशानी के बारे में बताया और कूर्मांचल चलकर मार्गदर्शन करने की अपील की। गांधी जी ने तब उनकी बातों को हंसकर टाल दिया। आंदोलनकारियों ने लौटकर अल्मोड़ा में बैठक की और उत्तरायणी मेले में काले कानूनों का विरोध करने के लिए रणनीति बनाई। 13 जनवरी 1921 की शाम आंदोलनकारियों ने चामी गांव के हरज्यू मंदिर में रात्रि विश्राम किया। तयशुदा कार्यक्रम के तहत 14 जनवरी को उन्होंने नगर में जुलूस निकाला। जिसमें नगर के श्याम लाल साह समेत बड़ी संख्या में आंदोलनकारी शामिल हुए।
अंग्रेज अफसर डायबिल के मना करने के बाद भी सरयू बगड़ में सभा हुई और आंदोलनकारियों ने काले कानूनों के रजिस्टरों को सरयू में प्रवाहित कर कुली उतार न देने का संकल्प लिया। इस आंदोलन को मिली सफलता से खुश होकर गांधी जी ने कुमाऊं का भ्रमण किया। 21 जून 1929 को कौसानी पहुंचे वहां रहकर उन्होंने गीता पर आधारित अनाशक्ति योग नामक पुस्तक लिखी। 14 दिन की यात्रा में वह 28 जून 1929 को वह नगर पहुंचे। नुमाइशखेत में सभाकर आंदोलन की सफलता पर लोगों की पीठ थपथपाई। स्वराज भवन की आधारशिला रखकर लोगों को आंदोलन को मुकाम तक पहुंचाने की सीख दी। गांधी जी ने जिस भवन में दो दिन का प्रवास किया उसमें जिला पंचायत का कार्यालय चल रहा है।