बागेश्वर में बंजर खेत में मछली पालन करता एक ग्रामीण।
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बंजर पड़े खेतों में आजीविका की फसल देखनी हो तो कांडा पड़ाव और दुधली गांव चले आइए। यहां आपको ऐसे ग्रामीण मिलेंगे जिन्होंने पहाड़ी राज्य में पलायन के सबसे बड़े कारण को अपने ही अंदाज में मात दी। हाड़तोड़ मेहनत के बूते इन ग्रामीणों ने बंजर खेतों में सफल आजीविका की इबारत खड़ी कर दी है।
नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि अकेले बागेश्वर जिले में पिछले दस सालों में चालीस फीसदी तक पलायन हुआ है। इन सबके बीच कुछ ग्रामीण परिवार ऐसे हैं जिन्होंने आजीविका के लिए पलायन का रास्ता चुनने की बजाय खेती की परंपरागत तकनीक में बदलाव का रास्ता अपनाया। बकौल ग्रामीण जिन खेतों में उनके बुजुर्ग अनाज उगाया करते थे, वे खेत आज या तो बंजर हो चुके हैं या उन खेतों में होने वाले अनाज को जंगली जानवर बर्बाद कर रहे हैं।
ऐसे में उन्हें आमदनी तो दूर अनाज के एक-एक दाने का मोहताज होना पड़ रहा था। इन हालातों केे बीच कांडा पड़ाव और दुधली के ग्रामीणों ने परंपरागत खेती को छोड़ बंजर पड़े खेतों में मछली पालन का व्यवसाय शुरू किया। खेतों में मनरेगा योजना के तहत बने तालाबों में मछलियां पल रही हैं। हर छह महीने में मछलियां बेचकर आज किसान 70 हजार से एक लाख तक की आय अर्जित कर रहे हैं। किसानों की ये मेहनत बेरोजगारी और बंजर खेती के चलते पलायन करने वाले परिवारों के लिए नजीर है।
यह किसान कमा रहे मुनाफा
गरुड़ विकास खंड के दुधिला गांव निवासी नरेश कुमार मछली पालन कर रहे हैं। इसी तरह कांडा पीपल के अनिल माजिला, टिटौली के गोविंद टाना सिनकुना के प्रयाग सिंह, बेदी बगड़ के गोकुुल सिंह, कराला पालड़ी के नंदन सिंह ने मछली पालन को आजीविका का साधन बनाया है। ब्यूरो
परंपरागत खेती के इतर आजीविका के अन्य साधनों से कम समय और खर्च में ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। कांडा पड़ाव और दुधली में मनरेगा के तहत मछली पालन के उत्साहजनक नतीजे सामने आए हैं। ग्रामीणों को आजीविका के अन्य साधनों पर काम करने के लिए आगे आना चाहिए। विभाग हर जरूरी मदद, तकनीकी सहयोग मुहैया कराएगा।
- मनोज कुमार, वरिष्ठ मत्स्य निरीक्षक, बागेश्वर।