बागेश्वर। सदियों बाद कोरोना के कारण उत्तरायणी के मेले नहीं हो पा रहे हैं। बागेश्वर के ऐतिहासिक उत्तरायणी मेले के साथ ही भराड़ी कपकोट में होने वाला मेला भी इस बार नहीं होगा। उत्तरायणी पर्व पर केवल धार्मिक अनुष्ठान होंगे। व्यावसायिक मेला न होने से कारोबारियों और हस्तशिल्पियों में निराशा है।
बागेश्वर का उत्तरायणी मेला उस समय राष्ट्रीय फलक पर छा गया था, जब वर्ष 1921 के उत्तरायणी मेले में कुमाऊं केशरी बद्री दत्त पांडे, हरगोविंद पंत समेत कई प्रखर स्वाधीनता सेनानियों ने सरयू तट पर कुली बेगार प्रथा के दस्तावेज नदी बहा दिए थे। यहीं से आजादी के आंदोलन को धार मिली थी। उत्तरायणी मेले में राजनीतिक मंच लगते आए हैं। इन मंचों से राजनीतिक पार्टियों के लोग अपनी पार्टियों के एजेंडे को लोगों के सामने रखते थे।
देश की अंग्रेजी शासनकाल और आजादी के बाद यह पहला मौका है जब उत्तरायणी का मेला उस स्वरूप में नहीं हो रहा है। जिला प्रशासन ने इस बार उत्तरायणी पर केवल धार्मिक अनुष्ठान और गंगा स्नान की अनुमति दी है। मकर संक्रांति को कुली बेगार की प्रथा के विरोध की सौवीं वर्षगांठ है। इस वजह से रैली निकालने की भी अनुमति है। मां बाराही मंदिर भराड़ी (कपकोट) में भी मेले का आयोजन इस बार नहीं होगा। उत्तरायणी के मेले पर बरेली, हल्द्वानी, उन्नाव, रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, हरियाणा, पंजाब, धारचूला, मुनस्यारी, लोहाघाट के साथ ही तमाम स्थानों से व्यापारी सामान लेकर पहुंचते थे। हस्तशिल्प की वस्तुओं की भरमार रहती थी। इस बार व्यापारिक स्टाल न लगने से हस्त शिल्पियों में भी मायूसी है। कपकोट के हस्त शिल्पी ठाकुर राम, बहादुर राम का कहना है कि मेला न होने की आशंका के चलते इस बार उन्होंने अन्य वर्षों की भांति सामग्री तैयार नहीं की है। (संवाद)