विश्वविख्यात पिंडारी ग्लेशियर रूट पर पौने दो साल पुरानी आपदा के कारण छाया सन्नाटा अब कुछ हद तक छंटने लगा है। साहसिक पर्यटन का लड़खड़ाया ढांचा फिर से बहाल होने लगा है। तीनों ग्लेशियरों के रूटों पर आवाजाही शुरू तो हो गई, लेकिन यह यात्रा अब पहले की तरह आसान नहीं रह गई है। लोग वैकल्पिक रास्तों से होकर आवागमन कर रहे हैं। रोमांच के साथ रिस्क भी बढ़ गया है।
ग्लेशियरों की यह यात्रा अप्रैल से जून और सितंबर से नवंबर तक होती है। केएमवीएन के अनुसार 2013 से पहले हर साल करीब साढे़ पांच हजार पर्यटक पिंडारी, कफनी, 1500 पर्यटक सुंदरढुंगा ग्लेशियर जाते थे। यात्रा से सालभर में निगम को करीब 40 लाख रुपए की आय होती थी। खातीगांव में पर्यटन से जुड़े तारा सिंह दानू, यामू सिंह के अनुसार पोर्टर, गाइड, दुकानदार आदि सैकड़ों स्थानीय लोगों की आजीविका इस यात्रा के साथ जुड़ी है। 18 जून 2013 की आपदा में तीनों ग्लेशियरों के पैदल रास्ते खिसककर नदियों में समा गए। कुछ समय तक यात्रा ठप रही।
आपदा प्रबंधन प्रशिक्षक भुवन चौबे ने बताया कि लोनिवि ने कुछ स्थानों पर रास्तों को ठीक किया, बाकी स्थानों पर चट्टानों पर पतला रास्ता होने के कारण यात्रा पहले की तरह आसान नहीं रही। कुछ स्थानों पर घूमकर जाना पड़ता है। नंदाकोट पर्यटन समिति के अध्यक्ष संजय परिहार का कहना है कि आपदा के बाद पर्यटन को काफी क्षति हुई है, अभी मार्गों को दुरुस्त नहीं किया गया। जिला साहसिक पर्यटन अधिकारी आरएस ऐरी ने बताया कि द्वाली से आगे रास्ता खराब है। पिछले दिनों की बर्फ से अल्पाइन एविलांस का भी खतरा है। इसी कारण यात्री प्रशासन की अनुमति लेकर स्वयं के जोखिम पर ट्रेकिंग करने जा रहे हैं। रानीखेत स्थित नेशनल आउटडोर लीडरशिप स्कूल के ट्रेकर्स समेत अन्य लोग भी ग्लेशियर की यात्रा कर चुके हैं।
चार दिन में भी हो सकती है ग्लेशियरों की यात्रा
पिंडारी ग्लेशियर की यात्रा कम समय मेें करने के लिए बागेश्वर से खरकिया तक 65 किमी जीप से और इसके बाद 29 किमी पैदल चलकर पहुंचा जाता है, जिसमें मात्र चार दिन लगते हैं जबकि ट्रेेकिंग के शौकीन सोंग तक वाहन से जाकर वहां से पदयात्रा शुरू करते हैं। लोहारखेत, धाकुड़ी होते हुए पिंडारी तक की कुल 35 किमी पदयात्रा की जा सकती है। इसी प्रकार वाहन से खरकिया तक पहुंचकर सुंदरढुंगा ग्लेशियर के लिए 23 किमी, कफनी के लिए खाती से 23 किमी पैदल जाना पड़ता है।