पहाड़ में आपदा के खतरे लगातार बढ़ते जा रहे हैं। आपदा के कारण जहां एक ओर हर साल कई लोग असमय मौत के मुंह में जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर हजारों साल पुराने गांवों का भूगोल भी बदल रहा है। बागेश्वर में पिछले पांच दशकों के भीतर हुई आपदा की बड़ी घटनाओं में 94 लोगों की मौतें हो चुकी हैं। जबकि जमीन के दरकने से जिले के 42 गांव अब रहने लायक नहीं रह गए हैं।
आपदा पहाड़ की धरती को लगातार तबाह कर रही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है भूस्खलन व बादल फटने से बागेश्वर जिले के 42 गांव इस समय खतरे की जद में हैं। जनपद में पिछले पांच दशकों के भीतर पांच बड़ी घटनाओं में 94 लोग असमय मौत का शिकार हो गए। इतना ही नहीं पिछले एक दशक के भीतर आपदा प्रभावित गांवों की संख्या में सबसे अधिक बढ़ोतरी हुई है। जमीन धंसने या फिर नदियों से भू कटाव के कारण खतरे में आए इन गांवों का भूगोल ही बदल गया। घरों के साथ ही रास्ते, पनघट, चरागाह सब कुछ बह जाने से इन गांवों की तस्वीर ही बदल चुकी है। ऐसे में इनका पुनर्वास ही एकमात्र विकल्प है।खतरे की जद में आए इन गांवों की हजारों की आबादी को सुरक्षित स्थानों पर बसाने के लिए आज तक कोई गंभीर पहल नहीं हुई है। इनमें से एकमात्र कुवारी गांव को ही पूर्ण विस्थापित करने की योजना पर अमल हो सका। ऐसे में मानसून के सक्रिय होते ही खतरे की जद में आए इन परिवारों को सरकारी भवनों या टेंटों में विस्थापित कर दिया जाता है। इसके बाद शासन-प्रशासन की कार्यवाही भूमि चयन तक ही सिमट जाती है। हालात सामान्य होने के बाद फिर से प्रभावित परिवार मौत का मुहाना बने घरों में वापस जाने को मजबूर हो जाते हैं। सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वास नहीं करने से दशकों से खानाबदोशों जैसी जिंदगी जी रहे इन हजारों परिवारों का संकट साल दर साल बढ़ता जा रहा है।
बादल फटने व भूस्खलन की बड़ी घटनाएं-
वर्ष - गांव - मृतकों की संख्या
1957 - सूडिंग - 18
1976 - बगर - 12
1981 - भयात कर्मी - 37
1994 - कनलगढ़ घाटी - 09
2010 - सुमगढ़ - 18
हाल के वर्षों में मौसम में बड़ा बदलाव आया है। अब तक जो भी घटनाएं हुई हैं उनमें प्राकृतिक व मानव जनित दोनों हैं। कुछ क्षेत्र जमीन के अंदर थ्रस्ट के कारण संवेदनशील हैं। विद्युत परियोजनाओं और सड़कों के निर्माण में जिस तरह से विस्फोटकों का प्रयोग किया गया वह भी आपदा का एक कारण है। भविष्य में आपदा के खतरे कम हों इसके लिए जियोलॉजिकल सर्वे किया जाना चाहिए। जो भी गांव या क्षेत्र खतरे में लगता है उनको सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वासित किया जाय। प्राकृतिक आपदाएं आती रहेंगी। इनसे बचने के लिए समय पर सुरक्षात्मक कदम उठाने होंगे।
- डॉ. शेखर पाठक, हिमालयी गांवों के अध्ययनकर्ता