शासन-प्रशासन की अनदेखी से डंगोली का प्रचीन नागनाथ मंदिर की खस्ता हाल है। अगर इस मंदिर का विकास हो और व्यापक प्रचार हो तो यहां पर्यटक खिंचे चले आएंगे।
बताया जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य जब बदरीनाथ से बैजनाथ धाम की ओर निकले थे तब वह कुछ देर नागनाथ मंदिर में रुके।
मान्यता है कि उन्होंने भी मंदिर के अंदर रखी विष्णु भगवान की पादुकाओं की पूजा की। मंदिर में आज भी पादुकाओं की पूजा होती है।
डंगोली का नागनाथ मंदिर ब्रिटिश हुकूमत के दौरान बने डंगोली-बैजनाथ पैदल मार्ग पर डंगोली के पास स्थित है। इतिहास विदों के अनुसार मंदिर का निर्माण बदरीनाथ मंदिर की स्थापना के दौरान ही हुआ है।
मंदिर की मान्यता को देखकर अंग्रेजों ने मंदिर समूह से जुड़े रामपुर, बिनखोली, थान डंगोली, कोठू के ग्रामीणों का भूमि लगान माफ कर दिया था।
आज भी चारों खामों के ग्रामीणों को भूमि का लगान नहीं चुकाना पड़ता है। इतिहास विदों और मंदिर समिति से जुड़े गोस्वामी समाज के लोगों के अनुसार आदि गुरुशंकराचार्य जब बदरीनाथ से बैजनाथ धाम की ओर निकले थे।
तब उन्होंने मंदिर में अल्प विश्राम करने के साथ भगवान विष्णु की पादुकाओं की पूजा की। आज भी चारों खामों के ग्रामीण बारी-बारी से मंदिर में पूजा करते हैं।
बिनखोली निवासी अमर नाथ गोस्वामी ने बताया कि नागनाथ मंदिर समूह को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करने को कई बार सरकार से कहा, लेकिन सरकार ने प्राचीन धरोहर के प्रति ध्यान नहीं दिया।
पूर्व ज्येष्ठ प्रमुख दिगंबर नाथ गोस्वामी ने बताया कि मंदिर को पुरातत्व विभाग की धरोहर में शामिल करने के साथ-साथ मंदिर को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र में शामिल किया जाना जरूरी है।