इंटर कालेज गागरीगोल में प्रधानाचार्य द्वारा निर्मित गेट।
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शिक्षा ही सब कुछ है, गुरुओं का मार्गदर्शन और माता-पिता के आशीर्वाद को जो लोग सर्वोपरि मानते हैं। वही आदर्श शिक्षक रूप में जाने जाते हैं। इन्हीं में से एक हैं। इंका गागरीगोल से कुछ दिन पहले सेवानिवृत्त हुए प्रधानाचार्य मोहन चंद्र पंत। उन्होंने सेवानिवृत्ति पर अपने दिवंगत पिता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी खीमानंद पंत की स्मृति में 75 हजार रुपये का मुख्य प्रवेश द्वार का निर्माण किया और उसे ज्ञान के मंदिर को अर्पित कर दिया। वह कहते हैं शिक्षा के लिए जितना भी किया जाए वह कम ही है।
गागरीगोल के दिवंगत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी खीमानंद पंत के पुत्र मोहन चंद्र पंत बचपन से ही मेधावी रहे हैं। उन्होंने शिक्षक बनने का सपना बचपन से ही संजोया था। वह 38 साल छह महीने तक इंका गागरीगोल के प्रधानाचार्य के पद का दायित्व निभाकर कुछ दिन पहले सेवानिवृत हुए। पंत ने 75 हजार रुपये से मुख्य प्रवेश द्वार बनाकर विद्यालय को भेंट किया। वह कहते हैं ज्ञान के इस मंदिर में देश के भविष्य तराशे जाते हैं। शिक्षा से ही सब कुछ हासिल होती है। इसलिए ज्ञान के मंदिरों की जितनी भी सेवा की जाए वह कम ही है।
दीगर हो कि पंत की मेहनत से विद्यालय का परिषदीय परीक्षाफल हमेशा शत प्रतिशत रहा। विद्यालय की छुटपुट समस्याओं का समाधान अपने ही संसाधनों से करना उनकी आदत में सुमार था। पंत के योगदान को प्रबंधन समिति के अध्यक्ष रेवाधर कंसेरी, प्रबंधक दीपक पाठक ने दूसरों के लिए प्रेरणादायक बताया है। शिक्षकों में नंदन सिंह अल्मियां, खंड शिक्षा अधिकारी गरुड़ उमेद सिंह रावत, उमेश जोशी और नवीन जोशी आदि ने पंत को कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक बताया । उनके तीन पुत्रों में भाष्कर पंत राजूहा रौलान्या, महेश पंत राजूहा भगरतोला और दीपक पंत रा प्रा.पाठशाला बाड़ीखेत में शिक्षक हैं।