बागेश्वर। बुधवार की रात दक्षिण पश्चिम मानसून के दस्तक देते ही उसने कहर बरपाना शुरू कर दिया है। आसमान में कड़कड़ाती बिजली के बीच तेज गरज के साथ बरसे बादलों ने लोगों को भयभीत कर दिया है। रातभर हुई मूसलाधार बारिश से लोग ठीक से सो भी नहीं सके आपदा प्रभावित क्षेत्रों में तो लोगों की रात अपने ईष्टदेव को मनाते हुए कटी।
बादल फटने की घटना की याद आते ही प्रभावित सिहर उठते हैं। लोगों का कहना है कि अभी तो मानसून पहुंचा ही है आगे न जाने क्या क्या होगा। जिले के कई गांवों का गत पखवाड़े से सड़क से संपर्क कटा हुआ है। प्रशासन ने जिन सड़कों को खुलवाया था वह बृहस्पतिवार की रात हुई बारिश से फिर से बंद हो गई हैं।
यह जिला बाढ़, भूस्खलन की दृष्टि से जहां अतिसंवेदनशील है वहीं, यह भूकंप की दृष्टि से जोन पांच में आता है। इन आपदाओं से हर साल जानमाल की क्षति होते रहती है। वर्षाकाल आते ही आपदा प्रभावित क्षेत्रों में लोगों का सुख चैन ही छिन जाता है। वर्ष 1983 में कर्मी गांव में बादल फटने से 37 लोगों की जान चली गई थी।
इस आपदा में कई लोगों के घर तबाह होने के साथ ही बड़ी संख्या में मवेशियों की मृत्यु हो गई थी। कृषि योग्य भूमि पानी के तेज बहाव में बह गई थी। 18 अगस्त 2010 में सुमगढ़ में बादल फटने से भूधंसाव हुआ इस घटना में सरस्वती शिशु मंदिर के दो कमरों में भारी मात्रा में मलबा घुसने से 18 बच्चे जिंदा दफन हो गए थे।
गांव के सात पैदल पुल गए। भारी मात्रा में कृषि योग्य भूमि में मलबा भर गया था। लेकिन पुनर्निर्माण के नाम पर वहां कुछ खास नहीं हुआ है। उसी दिन रेवती घाटी में कई जगह बादल फट गए। हरसिंग्याबगड़ में एक महिला की दबकर मृत्यु हो गई थी। रेवती नदी के उफनाने से सात पैदल पुल बह गए थे उनमें से घटबगड़ के पास खमियागाड़ जैसे कई पुलों का निर्माण नहीं हो सका है।
जिससे बच्चों को स्कूल आने जाने में कई परेशानियां झेलनी पड़ रही है इस आपदा में 300 नाली से भी अधिक उपजाऊ भूमि तबाह हो गई है। सुरक्षा के नाम पर रेवती नदी के कुछ हिस्सों में ही सुरक्षा दीवार बनाई गई है। वर्ष 1996 में कन्यालीकोट से स्यालढुंगा तोक में बादल फटने से तीन लोगों की मृत्यु हो गई जबकि ग्राम पंचायत में कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ है।
वर्ष 1980 में कपकोट के ही बघर गांव में बादल फटने से कई लोग हताहत हुए थे। बागेश्वर ब्लॉक के हड़बाड़ में 1995 में बादल फटने से एक महिला की मलबे में दबने से मृत्यु हो गई थी। वर्ष 1956 में सुडिंग लोहारखेत में बादल फटने से आधा गांव तबाह हो गया था, लेकिन प्रभावित गांवों में सुरक्षा के ठोस इंतजाम नहीं किए गए हैं।
कौन-कौन क्षेत्र हैं आपदा प्रभावित क्षेत्र
- मल्लादानपुर कपकोट के पिंडर, सरयू घाटी।
- बिचला दानपुर कपकोट के रामगंगा, रेवती, महरगाड़घाटी।
- तल्ला दानपुर कपकोट के कनलगढ़, खीरगंगा घाटी।
- नाकुरी पट्टी, पुुंगरघाटी।
- बागेश्वर में लाहुरघाटी, कुलूरघाटी।
बागेश्वर। डीएम भूपाल सिंह मनराल ने कहा कि जिले का आपदा प्रबंधन केंद्र पहले से ही मुस्तैद है। सरकारी महकमों, पुलिस को अलर्ट रहने के निर्देश दिए गए हैं। नोडल अधिकारियों को आपदा से संबंधित घटना को तुरंत कंट्रोल रूम को देने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों, कर्मचारियों को अपने कार्य क्षेत्र में रहने के कड़े निर्देश दिए गए हैं। खोजबचाव दलों के पास उपकरणों की कोई कमी नहीं है।
स्वास्थ्य विभाग को दवाईयों, पूर्ति विभाग को आवश्यक वस्तुओं की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने लोनिवि, पीएमजीएसवाई, एडीबी को बंद सड़कों को तत्काल खोलने जबकि नदियों के किनारे बसे लोगों को सुरक्षित स्थलों पर बसाने के लिए संबंधित एसडीएम को निर्देश दिए गए हैं। शिक्षा विभाग को जीर्णशीर्ण स्कूलों के बच्चों को पंचायत घरों, जनमिलन केंद्रों में शिफ्ट करने को कहा गया है।
बागेश्वर। प्रशासन ने जिला मुुख्यालय, बागेश्वर, कपकोट, गरुड़, कांडा, काफलीगैर, दुग नाकुरी तहसीलों में कंट्रोल रूम स्थापित किए हैं। आपदा प्रबंधन अधिकारी शशि सुयाल ने बताया कि कंट्रोल रूम 24 घंटे काम करेगा। इनमें किसी भी प्रकार की घटना सूचना दी जा सकती है। सूचना मिलते ही आपदा प्रबंधन की टीम सक्रिय हो जाएगी। जहां जिस तरह की सहायता की जरूरत पड़ेगी तो डीएम के निर्देशन अधिकारी उसकी पूर्ति करेंगे।