बागेश्वर। उत्तराखंड विकेंद्रीकृत जलागम विकास परियोजना (ग्राम्या) में कामकाज ढर्रा कैसा है, इसका अंदाजा कपकोट विकासखंड के दोबाड़ ग्राम पंचायत के एक मामले से लगाया जा सकता है। इस ग्राम पंचायत में परियोजना के तहत पशु आवास सामग्री के लिए मिले 80 हजार रुपये पूर्व प्रधान करीब डेढ़ वर्ष तक अपने पास दबाए रही।
दोबाड़ के तत्कालीन प्रधान को ग्राम पंचायत में दो पशु आवास सामग्री के लिए ग्राम्या से 80 हजार रुपये दिए गए लेकिन धनराशि से पशु आवास सामग्री नहीं खरीदी गई। आरोप है कि दोबाड़ में तब महिला प्रधान थी, प्रधान का कामकाज उसका पति देखता था।
कार्यकाल पूर्ण होने के बाद भी जब यह धनराशि ग्राम पंचायत को नहीं मिली तो नव निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने विभाग पर पशु आवास सामग्री के लिए मिली रकम की वसूली के लिए दबाव बनाया। उनका कहना था कि इस वजह से ग्राम पंचायत में ग्राम्या के कार्यों पर भी रोक लग गई थी। जनदबाव के बाद इस महीने की शुरुआत में पूर्व प्रधान के पति ने पशु आवास सामग्री ग्राम पंचायत को दे दी।
मामले में एकीकृत जलागम परियोजना के उप परियोजना प्रबंधक एलएस रावत ने स्वीकार किया कि पूर्व प्रधान ने पशु आवास सामग्री ग्राम पंचायत को नहीं दी थी, जो अब दे दी है।