फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

महिला दिवस: मेहनत से नहीं चुराया जी...कट्टे में सब्जी रखकर बाजार लाती हैं चंपा, सालाना कमा रहीं डेढ़ लाख

Sat, 08 Mar 2025 11:49 AM IST
हीरा मेहरा दिनेश नेगी, संवाद

सार

59 साल की उम्र में भी चंपा देवी डलिया और कट्टे में सब्जी रखकर सड़क तक लाती हैं। गरुड़ और कौसानी के बाजार में सब्जी बेचकर सालाना डेढ़ लाख रुपये से अधिक की आमदनी कर रही हैं।
विज्ञापन
चंपा देवी - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

एक ओर पलायन से खाली होते पहाड़ों में खेतीबाड़ी कम हो रही है, दूसरी ओर चंपा देवी जैसी जीवट महिलाएं आज भी जी तोड़ मेहनत कर जमीन से सोना बना रही हैं। 59 साल की उम्र में भी वह डलिया और कट्टे में सब्जी रखकर सड़क तक लाती हैं। गरुड़ और कौसानी के बाजार में सब्जी बेचकर सालाना डेढ़ लाख रुपये से अधिक की आमदनी कर रही हैं।

18 साल की उम्र में बहू बनकर बजवाड़ गांव आने के बाद चंपा देवी ने खुद को खेतीबाड़ी में समर्पित कर दिया। करीब 14 साल बाद उनके मन में खेती से आजीविका कमाने का विचार आया। इसे साकार करते हुए वह गांव से डलिया में गडेरी रखकर छह किमी पैदल चलकर गरुड़ बाजार पहुंची। पहली बार उन्होंने छह रुपये किलो गडेरी बेची थी। करीब दो घंटे में उनकी सारी गडेरी बिक गई। इसके बाद यह सिलसिला चलता गया। जंगली सुअरों का आतंक बढ़ने के बाद गडेरी को नुकसान होने लगा तो उन्होंने बीन, लाही, पालक, धनिया, लहसुन, गोभी, मटर, लौकी, तोरई, कद्दू पैदा करना शुरू कर दिया।

अभी वह करीब सात नाली जमीन पर सब्जी और फसल उत्पादन करती हैं। वह हर सप्ताह संडे मार्केट में सब्जी बेचने आती हैं। इस उम्र में भी वह गांव से मथुरो पाटली तक दो किमी पैदल चलकर डलिया और कट्टों में सब्जी लाती हैं। इसके बाद उन्हें वाहन से गरुड़ बाजार पहुंचाकर बेचती हैं। सप्ताह के बाकी दिन वह कौसानी बाजार, होटल और थानों में जाकर सब्जी बेचती हैं। सीजन के समय वह हर साल चार-पांच श्रमिकों की मदद लेती हैं। जिसके लिए उन्हें 60 से 70 हजार रुपये मजदूरी, सब्जी और दूध-दही देनी पड़ती है।

मट्ठा बेचने का चलाया चलन

विज्ञापन

चंपा देवी बताती हैं कि करीब दस साल पहले उन्होंने पहली बार मट्ठा बेचने का चलन चलाया। तब तक लोग केवल दूध-दही बेचा करते थे। उन्होंने 10 रुपये लीटर के हिसाब से मट्ठा बेचा। वर्तमान में वह हर सप्ताह 10 से 12 लीटर मट्ठा 20 रुपये लीटर के हिसाब से बेच रही हैं। इसके अलावा वह गाय का घी भी बेचती हैं। उन्होंने मछली पालन और बकरी पालन की भी शुरूआत की है। हालांकि गांव तक सड़क नहीं होने के कारण भी उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा भाड़े में खर्च हो जाता है।

परिवार का नहीं मिला अपेक्षित सहयोग
चंपा देवी के पुत्र और बहू रुद्रपुर में रहते हैं। घर में उनके पति रेवाधर जोशी और दो पोतियां रहती हैं। उन्होंने बताया कि पोतियां मदद करती हैं, लेकिन लड़के को यह काम रास नहीं आया। पहले वह भी साथ में रहकर खूब मेहनत करता था। एक बार ओलावृष्टि से टमाटर नष्ट हुए तो वह नौकरी करने चला गया।

मेहनत से नहीं डर, पर उम्र का होने लगा असर

विज्ञापन

चंपा देवी बताती हैं कि मेहनत से कभी डर नहीं लगा, लेकिन अब उम्र का असर दिखने लगा है। अब सिर पर सब्जी से भरा कट्टा या डलिया लेकर चार किमी दूर कौसानी या दो किमी दूर सड़क तक चलना मुश्किल होने लगा है। अगर सहयोग मिलता तो सालाना तीन से चार लाख तक की कमाई आसानी से होती।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें