एक ओर पलायन से खाली होते पहाड़ों में खेतीबाड़ी कम हो रही है, दूसरी ओर चंपा देवी जैसी जीवट महिलाएं आज भी जी तोड़ मेहनत कर जमीन से सोना बना रही हैं। 59 साल की उम्र में भी वह डलिया और कट्टे में सब्जी रखकर सड़क तक लाती हैं। गरुड़ और कौसानी के बाजार में सब्जी बेचकर सालाना डेढ़ लाख रुपये से अधिक की आमदनी कर रही हैं।
18 साल की उम्र में बहू बनकर बजवाड़ गांव आने के बाद चंपा देवी ने खुद को खेतीबाड़ी में समर्पित कर दिया। करीब 14 साल बाद उनके मन में खेती से आजीविका कमाने का विचार आया। इसे साकार करते हुए वह गांव से डलिया में गडेरी रखकर छह किमी पैदल चलकर गरुड़ बाजार पहुंची। पहली बार उन्होंने छह रुपये किलो गडेरी बेची थी। करीब दो घंटे में उनकी सारी गडेरी बिक गई। इसके बाद यह सिलसिला चलता गया। जंगली सुअरों का आतंक बढ़ने के बाद गडेरी को नुकसान होने लगा तो उन्होंने बीन, लाही, पालक, धनिया, लहसुन, गोभी, मटर, लौकी, तोरई, कद्दू पैदा करना शुरू कर दिया।
अभी वह करीब सात नाली जमीन पर सब्जी और फसल उत्पादन करती हैं। वह हर सप्ताह संडे मार्केट में सब्जी बेचने आती हैं। इस उम्र में भी वह गांव से मथुरो पाटली तक दो किमी पैदल चलकर डलिया और कट्टों में सब्जी लाती हैं। इसके बाद उन्हें वाहन से गरुड़ बाजार पहुंचाकर बेचती हैं। सप्ताह के बाकी दिन वह कौसानी बाजार, होटल और थानों में जाकर सब्जी बेचती हैं। सीजन के समय वह हर साल चार-पांच श्रमिकों की मदद लेती हैं। जिसके लिए उन्हें 60 से 70 हजार रुपये मजदूरी, सब्जी और दूध-दही देनी पड़ती है।
मट्ठा बेचने का चलाया चलन
परिवार का नहीं मिला अपेक्षित सहयोग
चंपा देवी के पुत्र और बहू रुद्रपुर में रहते हैं। घर में उनके पति रेवाधर जोशी और दो पोतियां रहती हैं। उन्होंने बताया कि पोतियां मदद करती हैं, लेकिन लड़के को यह काम रास नहीं आया। पहले वह भी साथ में रहकर खूब मेहनत करता था। एक बार ओलावृष्टि से टमाटर नष्ट हुए तो वह नौकरी करने चला गया।
मेहनत से नहीं डर, पर उम्र का होने लगा असर